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Tuesday, June 28, 2016

जीवन के रंग

पत्तों के जंगलों में
घरोंदा बनाया
न आंखों से, न कानों से
न हाथों से कोई टोह पा सका
वह और उसके बच्चे
पहरे में रहे, पल रहे
पेड़ की जड़ों पर नजरें गड़ी थींं
दरिंदे इंसान की
खच्च की आवाज ने
बिखेर दिए तिनके तिनके
उजाड़ दिया सुखद संसार को
सुरक्षा बेनक़ाब हुई
परदे न रहे
खुली धरती और खुला आसमान
हंसने लगा
हाहाकार सुनाई पड़ने लगा
कोमलता कुचली गई
मानव दानव में बदला लगा
पत्तों में लिपटे मासूमों ने मूंद ली आंखें
वे बच्चे मां के थे
मां ने अंतिम श्वास
अपने बच्चों पर अपने पूरे पंखों को
फैलाते हुए ली।







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