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Monday, February 21, 2022

मंगल पांडेय - परिचय

मैं मंगल पांडेय भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम क्रांतिकारी सेनानी। 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में मैंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जब मैं मात्र 22 वर्ष का था मैं ईस्ट इंडिया कंपनी की 34 वीं बंगाल नेटिव इंफैक्टरी के रेजिमेंट का सिपाही बना। अंग्रेजों के खिलाफ़ मेरा नारा था 'मारो फिरंगी को ' जिसने भारतीयों का हौसला बढ़ाया। मेरा जन्म नगवा, बलिया, उत्तर प्रदेश के एक ब्राह्मण परिवार में 19 जुलाई 1827 में हुआ। मेरे पिता दिवाकर पांडेय मुझ पर गर्व महसूस करते थे। जानते हो---- 1857 की क्रांति वहा क्रांति है जिसने अंग्रेजी साम्राज्य ईस्ट इंडिया कंपनी की भारत में नींव हिला दी,विभिन्न जगह पर चल रहे अंग्रेजी साम्राज्य की मनमानी को भारत की आक्रोशित जनता ने नकारा और विरोध किया। 1857 का सिपाही विद्रोह कैसे शुरु हुआ? सिर्फ एक बंदूक की वजह से। उस समय तक सिपाहियों को पुरानी बंदूक 0. 577 कैलीबर दी जाती थी जो ब्राउन बैस के मुकाबले बहुत शक्तिशाली और अचूक थी। नयी बंदूक दी गई लेकिन उसमें गोली दागने का जो प्रिकशन कैप था उसे दाँतों से काटकर ही खोलना पड़ता था और वह चर्बी का बना होता था। बस, सिपाहियों में अफवाह फैल गई कि कारतूस में लगी हुई चर्बी सुअर और गाय के मांस से बनी है।फिर क्या विद्रोह की आग भड़क उठी। मैने कारतूस को काटने से इंकार कर दिया। 29 मार्च 1857 में मैंने प्रथम बार एन्फील्ड राइफल का प्रयोग किया था। दो ब्रिटिश अफसरों पर हमला किया जिससे मुझपर मुकदमा चला। अंग्रेजों को मुझसे डर लगने लगा। उन्होंने सोचा कि यदि मंगल पांडेय को फांसी नहीं दी गई तो स्वतंत्रता आंदोलन की चिंगारी पूरे भारत में फैल जाएगी। अंग्रेजों ने 18 अप्रैल की जगह 8 अप्रैल 1857 को ही मुझे फांसी दे दी। मैंने अपने देश के लिए प्राण न्योछावर किए। मेरे मृत्यु दिवस को मेरा भारत 'बलिदान दिवस' के रूप में मनाता है। आजादी की इस लड़ाई में जनता ने मुझे नायक के रूप में सम्मान दिया। 1984 में भारत सरकार ने एक डाक टिकट भी जारी किया। जय हिंद जय भारत।

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