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Monday, February 21, 2022

आग - कविता

आग जलती हुई आग धुएँ से लिपटी न जाने कितने रहस्य दब कर मर जाते हैं जब घर के भीतर ही उगल रहे थीं चिंगारियांँ भीतर से आग उगलती मोटे बरगद की हर डालियाँ ताबड़तोड़ मारपीट से भरे घर में दहशत का धुंध फैल रहा था कितने ही भावों को कुचला गया विचारों को दफनाया गया अस्मिताओं की खिल्ली उड़ाई छोटी- सी आशाओं पर डंडे का प्रहार उम्मीद की परतों की जम कर धुलाई आग की रोशनी में दम तोड़ती श्वासें जीवन किसका और किसी और का अधिकार खोखले होते घर की दीवारों पर काले रंग का प्रहार आग जब जलती है राख हो जाती हैं आशाएंँ, उम्मीद और आकांक्षाएँ वह अभी-अभी चिता से उठ कर आई थी घर की आग ने उसे नहीं छोड़ा विचारों के मतभेद, मन के भेद शरीर के भेद-भाव, समाज

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