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Monday, February 21, 2022

भारतीय वेद चिंतक हैं - डॉ वसुंधरा मिश्र - लेख

भारतीय वेद चिंतक हैं - - डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता मनुष्य के लिए उसका जीवन प्रत्यक्ष ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण विषय है। जीवन क्या है तथा इसे कैसे सफल बनाया जा सकता है, इसे जानने की आवश्यकता है। मनुष्य को सुख संपत्ति वस्तुओं की इच्छा रहती है परंतु उसका यह दृष्टिकोण बहिर्मुखी होता है। इंद्रियों के विषयों में से प्रेरित - प्रचालित होता है वह, अपने व्यक्तित्व और अस्तित्व के संबंध में सजग हो सकता है तथा इसे सजगता पूर्वक परिस्थितियों में प्रेरित प्रचालित कर सकता है। भारतीय संस्कृति और दर्शन में 'आत्मानं विद्धि' ज्ञान तथा योग का प्रथम आदर्श रहा है। वेदों में अमर शब्दों द्वारा तथा उपनिषदों में आत्मजिज्ञासा द्वारा जीवन का प्रथम तथा पूर्ण विषय माना है। आत्मा और ब्रह्म विषयक खोज ही इस समय के आचार्यों और शिष्यों का विशेष कार्य था । बाद में, संस्कृत साहित्य तथा मध्यकालीन संतों की वाणी में भी भारतीय संस्कृति की यह प्रेरणा तथा भारतीय स्वभाव की यह प्रवृत्ति बराबर मिलती रही है। प्रकृति सदैव से ही चिंतन का विषय रही है। चाहे वह वैदिक काल हो या वर्तमान, वैज्ञानिक युग या भौतिकवाद। अब ये माना जा रहा है कि विज्ञान अब एक अंध गली में आ गया है जिसका निवर्तन केवल परम सत्ता और परम सत्य की मान्यताओं से ही संभव है। डॉ रघुवीर ने वैदिक मिस्टिसिज्म से संबंधित वेदों की अनेक रहस्यमयी ऋचाओं के उद्धरण दिए हैं। (धर्म, दर्शन और विज्ञान में रहस्यवाद, संपादक कल्याणमल लोढा, वसुंधरा मिश्र, पृष्ठ 1) वेदों के ये चार महावाक्य प्रसिद्ध हैं जो जीवन के रहस्यों को उजागर करते हैं - 'अहं ब्रह्मास्मि' जो यजुर्वेद बृहदारण्यक उपनिषद् से ,'प्रज्ञानं ब्रह्म' जो ऋग्वेद के ऐतरेय उपनिषद् से, 'अयमात्मा ब्रह्म' जो अथर्ववेद के माण्डूक्य उपनिषद् से , 'तत्वमसि' सामवेद के छान्दोग्य उपनिषद् से। ये उपनिषद् व्यक्ति को क्षुद्रता, तुच्छता व संकीर्णता से मुक्त कर उसे उसके विराट स्वरूप से परिचित होने का संदेश देते हैं। नाद - बिंदु के बीच भी रहस्य है और इसी संबंध के कारण ही कला की अभिव्यक्ति है। परम रहस्य को परम प्रेम से कहने वाला मुझे ही प्राप्त होगा। इस गुह्य परमतत्व को मापना उतना ही कठिन है जितना पैर से सिर की छाया को मापना। डॉ राधाकृष्णन इस रहस्य को मानवीय प्रकृति का सतत अभ्यास कहते हैं और उसकी उपलब्धि को आध्यात्मिक तत्व कहते हैं। यह एक जीवन पद्धति है। मौलाना अब्दुल कलाम आजाद का मानना है कि इंद्रियों से हम परम सत्य का संधान नहीं कर सकते। हमें आंतरिक आस्वादन प्राप्त करने के लिए विषयों का त्याग करना होगा। यह विश्वातीत और विश्वात्मक दोनों का बोध कराता है।( पूर्व और पश्चिम के दर्शन का इतिहास, प्रथम खंड, पृ 20,धर्म दर्शन और विज्ञान में रहस्यवाद, पृष्ठ 3-4 )रहस्यवाद, रहस्य संप्रदाय के कई अर्थ हैं, गुह्य ब्रह्म, गुह्य तत्व, गुह्य मार्ग आदि शब्द भी आते हैं। वेद, उपनिषद ऋषि की 'निव्यावचांसी' गुह्य वाणी है।ऋग्वेद में 1.164.39 में कहा गया है 'ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्यस्मिन देवा अधि विश्वे निषेदुः यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति च इत्तद्विदुस्त इमे समासते ।' अविनाशी ऋचाएँ व्योम में व्याप्त हैं, उनमें संपूर्ण देव शक्तियों का वास है, जो इस तत्व को नहीं जानता, उसके लिए ऋचाएँ क्या करेंगी, जो जानते हैं वे ही सदुपयोग करते हैं। परा पश्यंती और मध्यमा वाणी को गुह्य बताया है (ऋग्वेद 1.164.45)पुनः ऋग्वेद 1.170.1 में इंद्र कहता है जो आज नहीं वह कल भी नहीं। जो हुआ नहीं, उसे किस प्रकार जानें। चित्त चलायमान है, उसे कौन जानता है, जो सर्वोच्च और अनन्य है। जब विचार से उसके समीप पहुँचा जाता है, तब वह विलुप्त होता है। सृष्टि रहस्य, ईश्वर, ब्रह्म, माया, जीव जगत से संबंधित चिंतन को प्रायः रहस्यवादी विवेचना के भीतर विश्लेषित किया जाता है। यह प्रक्रिया प्रायः एक सौ वर्ष पुरानी है मिस्ट कोहरा या झिलमिलाते अंधकार या प्रकाश से भारतीय ज्ञान काण्ड का क्या संबंध है? इस पर भी सोचना बंद है। रहस्यवाद शब्द को अभिधान या संज्ञा या नाम की प्रतीकात्मक रूढ़ि में व्यक्त करते हैं फिर भी एक सौ वर्ष पुराने इस कोहरे की बात पर बातचीत की आवश्यकता है। वास्तव में, अंधेरे का कोहरा या उजाले का कोहरा अर्थात् अमाक्षपा का झिलमिल कुहासा पूर्णिमाक्षपा का झिलमिल कुहासा दोनों समान है। यूरोप जैसे ठंडे देशों में चांँदनी, शुक्ल पक्ष, सुदी का भी कोहरा होता है और कृष्ण पक्ष बदी का भी कोहरा होता है। वहाँ के चिंतन की मुख्य प्रवृत्ति कोहरा हटाने की होती है। यह अदृश्य, मात्रिका - विद्या से संबंधित हो या रूढ़ि प्राप्त प्रतीक बद्ध संख्याओं से संबंधित हो, सारा चिंतन उनके लिए मिस्टिक है। यूरोप के चिंतन में मिस्टिक शब्द का प्रयोग अस्पष्ट, अपरिभाषित और आध्यात्मिक तीनों के लिए किया जाता है। इसका प्रयोग दर्शन की मीमांसा, साहित्य का विवेचन और प्रकृति, विकृति, संस्कृति तीनों की समीक्षा के लिए भी किया गया है। अंग्रेज सत्ता के भारतवर्ष में स्थापन के आरंभ में बंगाल और महाराष्ट्र में जो शिक्षित ब्राह्मण वर्ग या विद्वत समाज खड़ा हुआ वह विदेशियों की सख्ती से उतना अपवित्र नहीं हुआ, न उनके शोषण से ही विचलित हुआ। यह विद्याव्यसनी - समाज पश्चिमी- विद्या, जीवन - शैली और ज्ञान - मीमांसा से अधिक प्रभावित हुआ। सूरत और कलकत्ता में केवल विदेशी कपड़े और विलास संबंधी सामग्री ही नहीं आती थीं किताबें भी आती थी उनका पहला पाठक महाराष्ट्र और बंगाल का पंडित होता था। बाद में साहित्य में भी रोमांटिक पोयट्री, शेली, कीट्स आदि में कुछ अस्पष्ट अमूर्त सांकेतिक तत्व हैं जिनको रहस्यवाद ही कहा गया। दक्षिण से लेकर उत्तर तक साहित्यिक क्षेत्र में रहस्यवाद शब्द चल पड़ा। कोई आध्यात्मिक आभा थी जो पश्चिमी रहस्यवाद से संवाद करती हुई दिखाई पड़ती थी। इसलिए ऋषियों मुनियों के प्रकाशवाद संतों के ज्योतिवाद और पश्चिमी दार्शनिकों और कवियों के रहस्यवाद में 'जोगजुगति'बैठ गई। इस पर सूक्ष्म मीमांसा होनी चाहिए। वेदों के कर्मकाण्ड और उपासना काण्ड के साथ ज्ञानकाण्ड का जो विकास हुआ उसी का क्रमशः विकास उपनिषदों वेदांत और अनेक आस्तिक भारतीय दर्शनों में भी हुआ। ब्रह्मविद्या से संबंधित जिज्ञासाओं और जिज्ञासाओं का मण्डन या विवेचन भारतीय दर्शनों में हुआ है। इसकी मूल धारणा अंधकार और प्रकाश, जीवन और मृत्यु, नाम और रूप, जीव और जगत जैसे निर्धारित द्वंद्वों से संबंधित है। इन द्वंद्वों की मीमांसा को तन्त्र योग और अध्यात्म में 'सहज' कहा जाता है। 'स' अर्थात रचना 'ह' अर्थात संहार। रचना और संहार से उत्पन्न विचार, थॉट, धारणा या चिन्तन को सहज कहा जाता है। इस सहज के भीतर ही अस्ति और नास्ति के दो सीमान्त निश्चित है। अंधकार ही तो प्रकाश है, बीच में कोई कोहरा नहीं है, कोई मिस्ट नहीं है, कोई अबूझ नहीं है, गूढ़ अवश्य है। भारतीय चिंतन में गूढ़ से अगूढ़ की ओर यात्रा की जाती है। हमारा ऋषि अंधकार से सीधे प्रकाश की ओर जाने की बात करता है। यह समझने की बात है कि रहस्य के सिद्धांत और प्रकाश के सिद्धांत में अंतर क्या है। रहस्य गोपन गुप्ताचार या छद्म के भीतर होता है। लेकिन प्रकाश, ज्ञान के अभाव और भाव से पूर्ण के बीच की दूरियाँ तय करता है। उपनिषदकार ईश्वर को इस प्रकार परिभाषित करता है - - - ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम् पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।। जब ईश्वर को पूर्ण और शून्य एकसाथ कहा जाता है तो मात्रिका ओम् को मानते हुए सारे अक्षरों और सारी संख्याओं का उसी एक सत्ता में विलय कर दिया जाता है। वह पूरा है। इसलिए कि उसमें पूरा जोड़ने पर पूरा परिणाम प्राप्त होता है। उस पूरे में से पूरा निकालने पर भी पूरा का पूरा बच जाता है। (धर्म दर्शन और विज्ञान में रहस्यवाद पृष्ठ 83-84 ) पूर्ण सत्ता अर्थात ब्रह्म की अवधारणा, ब्रह्म साथ ब्रह्मांड , ब्रह्मांड के साथ पिण्ड, अणु अक्षर स्वर मात्रा व्यंजन का विचार करते हुए भारतीय दर्शन में ज्ञानज्योति या ज्ञान काण्ड का विलक्षण ढंग से विकास हुआ है। प्रायः सभी उपनिषदों में आत्मा की व्यापकता, अज्ञेयता, ब्रह्म की अनिर्वचनीयता, आत्मज्ञान इत्यादि का वर्णन है। वास्तव में ज्ञानकाण्ड कर्म काण्ड के समानांतर भीतरी संज्ञान से संबंधित विद्या है। केनोपनिषद् के तीसरे खण्ड के सत्रहवें भाग में उमा के प्रादुर्भाव का वर्णन है। जिसमें उमा जैसी आद्याशक्ति की धारणा विद्यमान है। इस रूपवती स्त्री के उद्भव की बात कही गई है जिसका रंग सोने का है और वह सदैव ईश्वर के साथ रहती है। वस्तुत यह विद्या है जो सारी सृष्टि को धारण करती है। ब्रह्मा विष्णु और महेश उसी से है। यही कबीर आदि संतों की उमा की अन्तर्ज्योति कल्पना में सीधा तादात्म्य है। यही ऋषि-मुनियों का ज्ञान संत के अनुभव के रूप में सामने आता है। (रहस्यवाद का रहस्य और ज्योतिवाद - डॉ शुकदेव सिंह, धर्म दर्शन और रहस्यवाद पृष्ठ 85) संतों के यहाँ ब्रह्मांड कल्पना बहुत दूर तक पुराणों, साथ ही सूफियों और ऋगवेदीय धारणाओं का मिलाजुला मौलिक विस्तार है। ये सभी ब्रह्मांड के खण्ड मन बुद्धि और अहंकार से आवृत्त माने जाते हैं।। मन का अहंकार तामस, बुद्धि का राजस, और अहंकार के आवरण को सात्विक अहंकार कहा जाता है। (पृष्ठ 87) इस पूरे ब्रह्माण्ड पर एक प्रणव कवच की भी कल्पना जुड़ी हुई है जो माण्डूक्य उपनिषद् के 'ओ$म इति अक्षर इदम्' की धारणा का परवर्ती विकास है। ओम् का कवच ब्रह्मांड का ज्योति कवच है। कुछ संतों के यहाँ ओ$म् के अ को ब्रह्मा उ को विष्णु और म को शिव माना गया है। इस तरह यह ज्योति कवच त्रिदेवता त्रिकाल त्रिलोक अर्थात तीन के जातीय विश्वास से सम्बद्ध हो जाता है। त्रिकोटी त्रिभुवन अर्थात तीन की धारणा ज्योतितत्व से पूर्ण संबद्ध है। संभवतः संत कबीर की रमैनी में इसी अन्तर्ज्योति सबद की बात कही गई है। सबद अर्थात ध्वनि, ध्वनि अर्थात आकाश, इस प्रकार के जगत मंडल इत्यादि की धारणाओं से खेचर साधनाओं, खेचरी मुद्राओं का तंत्र भी दायें बायें जुड़ जाता है। प्रत्येक ब्रह्मांड के साथ एक व्यष्टि ज्योति सम्बद्ध मानी जाती है जिसे नाद या स्वभाव ज्योति कहते हैं - - - अकारश्चाप्युकारश्च मकारो बिन्दुनादकौ । पञ्चाक्षराण्यमून्याहुः प्रणवस्थानि पण्डिताः।। (तंत्रोक्त) ओम् के बिंदु से प्रणव का व्याख्यान होता है यह एक ऐसी ज्योति है जिसे गायत्री भी कहते हैं। गायत्री ज्योति से सम्बद्ध एक मार्ग तत्व भी है जिसके ज्ञान से अंधकार दूर होता है। संतों की और भी अनेक कल्पनाएँ हैं और ब्रह्मांड की विविध रचनाएँ हैं जहाँ अंधेरे से बाहर निकलने की एक प्रक्रिया है। कुहरा - मिस्ट या अर्धप्रकाश, अंधकार की झिलमिलाहट नहीं है। वह सहस्र सूर्यों से भी अधिक आत्मप्रकाश है इसे ही संत ज्योति का ज्योति से मिलना कहते हैं।' जोत में जोत समानी 'यही है, अध्यात्म और प्रकाश से प्रकाश का मिलन है। यही परम अनुभूति प्रज्ञा है। यही ब्रह्मानंद की स्थिति है। योगशास्त्र में चित्त शक्ति को 'स्वबुद्धि संवेदन कहा है। प्रज्ञा को' नव नवोन्मेष शालिनी प्रतिभा मता 'अथवा अभिनव गुप्त के अनुसार प्रतिभा अपूर्व वस्तु निर्माण क्षमता को कहा गया है। इस अवसर पर स्तर पर अचेतन, अवचेतन और शुभकामनाएं सचेतन की सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं। यही अध्यात्मिक विकास की पूर्णता है। इसे ही परम सत्ता का उद्भावना कह सकते हैं। अरविंद ने इसे ही अतिमानस की संज्ञा दी है। लब्धप्रतिष्ठ वैज्ञानिक पाल डेविस मानते हैं कि रहस्यवादी मार्ग आंतरिक शांति से भी महत है। वह आनंद में स्थैर्य प्राप्त कर उच्चतम भावना प्राप्त करता है।यही वास्तविक पवित्र विजन है। वैज्ञानिक केन विलबर मानते हैं कि रहस्यवादी चेतना सत्य और ऋत का प्रत्यक्ष बोध कराती है। जहांँ अहं और इदं का भेद नहीं रहता। राबर्ट बेरी चेतना को सामान्य और विशवचेतना से जोड़ते हैं। सूफी रहस्यवादी मंसूर ने भी कहा कि मैं ब्रह्म हूँ। श्री अरविंद ने इसे ही आत्मा का संशुद्धिकरण और एक दृष्टि से सांस्कृतिककरण कहा है। छांदोग्य श्रुति (6.15,3.15.1)में कहा गया है कि जिसकी वाणी मन में, मन प्राण में, प्राण तेज में और तेज परमदेवता में लीन हो जाती है वह आत्मा 'तत्वमसि' हो जाती है और यही चेतना की उच्चतम स्थिति है। 'मैं ही सब कुछ हूँ' 'अह्मैवेदं सर्वम् ', मैं ही भूमा हूँ। इस चेतना का विकास 'ममैवासो' 'तस्मैवाहम् स एवाहम्' मैं तुम्हारा हूँ, तुम मेरे हो और तुम और हम एक हैं आदि से हैं। (वृहदारण्यक 7.25, छांदोग्य 2.1.1,1.3.14)(देखें - धर्म दर्शन और विज्ञान में रहस्यवाद पृष्ठ 15)इसी तरह वाक् साधना में बैखरी जो अभिव्यक्ति है और बैखरी से मध्यमा, पश्यंती और परा तक की यात्रा है। बैखरी 'विश्व विग्रहाः' है। इसके अतिक्रमण के पश्चात आंतर शब्द का समाश्रय होता है। बैखरी श्रवण मध्यमा मंत्रभूमि आत्मप्रकाश(हृदयस्थ) है। यही हिरण्यमय शब्द है। इसमें नादमय चिद्ररश्मियाँ हैं और इसे व्यक्ताव्यक्तता कहा जाता है। पश्यंती दिव्य वाक् है, वह स्वप्रकाश रूप है। इच्छा शक्ति पश्यंती, ज्ञान शक्ति मध्यमा और क्रियाशक्ति बैखरी है। पश्यंती अमृत कला है, परा महेशी और छत्तीस तत्वों के विकास की भूमि। यजुः ने इसे 'परास्य शक्ति विवधैव श्रूयते 'कहा है। परम योगी की यह अखण्ड आनन्दानुभूति है। 'स्वरूप ज्योति रेवान्तः पराः वागनपायिनी 'रहस्यानुभूति की चरम अवस्था ही परा होती है। अभिव्यक्ति मध्यमा और बैखरी में होती है। सारी प्रतीकात्मकता का यही क्रम है। वेदों में में ऋत का भी महत्वपूर्ण स्थान है। अथर्ववेद (12.1.1)में सत्य, ऋत, बृहत ऋत को चित्त कहा गया है 'ऋतस्थ पन्था 'अर्थात परम तत्व की उपलब्धि का मार्ग। कठोपनिषद् के अनुसार ऋत निरपेक्ष और सत्य सापेक्ष है। ऋत परिस्थिति पर आश्रित नहीं रहता।ऋत विबन्तौ सुकृतस्य लोकं गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे (3.1)।तैत्तिरीय में भी ऋत और सत्य को भिन्न माना है। ऋत ही संवित् है, सर्वसाक्षी, परम, निर्विकल्प। जड़ - चेतन सबमें यह नियम परिव्याप्त है।( धर्म ,दर्शन और विज्ञान में रहस्यवाद पृष्ठ 16)यही वह जीवन पद्धति है जिसमें भीतर और बाहर द्वैत वैषम्य विशवचेतना की समरसता में परिणत होता है। रहस्यवादी चेतना का संबंध अन्तः प्रज्ञा से है, पर वह बौद्धिक न होकर असाधारण अनुभूति से अभिव्यक्ति होती है। आचार्य अभिनवगुप्त ने भी माना है कि स्वसंवेदन ज्ञान ही स्मृति संवेदन है। आधुनिक मनोविज्ञान में भी विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने रहस्यवाद ईश्वर के साथ एकता का स्पष्ट संवेदन है जो ब्रह्म के साथ जीवन का पूर्ण तादात्म्य है। आज मनोविज्ञान एक्स्ट्रा संवेदन की चर्चा करता है जिसमें अतिन्द्रिय दृष्टि का भी विवेचन किया गया है। यही रहस्यवादी संवेदन और प्रातिभ ज्ञान से अपने व्यक्तित्व की रक्षा करते हुए समष्टिबोध की ओर उन्मुख होता है। पश्चिम में इस विषय पर अनुसंधान चल रहे हैं। आज धार्मिक यूटोपिया जैसे विषयों पर चर्चा हो रही है। वैज्ञानिक रहस्यवाद में भी जड़ चेतन की अखंड चेतना, ब्रह्मांड की सतत क्रियान्वित और उसके केंद्र में मानव को माना है। यत् पिण्डे तत् ब्रह्मांडे पिण्ड ब्रह्मांड से एकाकार हो जाता है, व्यष्टि समष्टि से। रहस्यवादी जीवन के प्रत्येक स्पंदन में इस तदाकारता में विराट पुरुष को देखता है एवं परम तत्व का संधान करता है।' इदमहं य एवास्मि सो$स्मि 'अब मैं वही हूँ। यही मानवीय जीवन की उच्चतम स्थिति है। ऋग्वेद की अनेक ऋचाओं में सार्वभौमिक रूप से सभी संस्कृतियों में परमतत्व और परमसत्य की की अनुभूतियाँ का प्रमाणिक सन्निवेश मिलता है। ऋषि अंगिरास कहते हैं, 'पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः' अर्थात हे मंत्राधिपति आपके पवित्र अंश सर्वत्र विद्यमान हैं। तप से परिपक्व होकर ही साधक उसे प्राप्त कर सकते हैं। वेद के पुरुष, हिरण्यगर्भ और नासदीय सूक्त तात्विक विवेचन में सभी उत्पत्तिशील पदार्थों का स्वामी हिरण्यगर्भ माना गया है - हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्यजातः पतिरेक आसीत् (ऋग्वेद 10.121.1) ईशावास्य उपनिषद के प्रथम मंत्र 'ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत' में ही ब्रह्म की व्यापकता से प्रारंभ है। वहीं यजुर्वेद 40.17 में 'हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्' आदि कहते हैं। ऋषि इसी को दिव्य दृष्टि से देखकर उस स्वरूप को प्रकट करते हैं। चेतनशील और जड़ सृष्टि सब उसी का रूप है। एक ही सतरूपं परमेश्वर का विद्वज्जन विविध प्रकार से वर्णन करते हैं।कहा गया है, 'एक सद् विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वान माहुः'। भारतीय मनीषा सब कोषों की मंजूषा हृदय को मानती है जो उस रहस्यमय आनंदस्वरूप को सुरक्षित रखता है। हृदय में स्थित दीपवत की जो अनंत रश्मियांँ हैं उनमें एक सूर्य मण्डल को भेदकर उठती हैं और उसी से ब्रह्मलोक का अतिक्रकर वपरमगति की प्राप्ति होती है (मैत्रायणी उपनिषद 6.30) कहा गया है 'हृदये चित्त संविद'। संविद का अर्थ है आभ्यंतर ज्ञान। हृदय आत्मा और शरीर का संधिस्थल है। हृदय में ही सबकी प्रतिष्ठा है। भारतीय वेदों की चिंतन प्रक्रिया व्यष्टि से समष्टि की ओर जाती है जो परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व के कल्याण के लिए है। यजुर्वेद में शिक्षा का प्रारंभ ही इन मंत्रों से होता है - - ॐ सहनाववतु सहनौ भुनक्तु. सहवीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु माँ विद्विषावहै।। ओम् शांतिः ओम् शांतिः ओम् शांतिः

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