Sunday, January 2, 2022
कविता ठंडी रातों में
ठंडी रातों में --
शाम गहराती रही
अंधेरा बढ़ता रहा
रात की कालिमा
मन में उतरने लगी
न तन का ख्याल न मन का।
रात खेल के मैदान- सी
काले रंग की रेखाओं में उतरने लगीं
कई आकृतियाँ डराती - सी
साँप सीढ़ी पर चढ़ती - उतराती।
काले रंग में वह गोरी - सी लड़की
ठिठुरन से सिकुड़ी दिवारों पर चलती
संभल- संभल गिरती - पड़ती
चेहरे पर मुस्कान झलक जाती
ओ मेरी प्यारी सखी! नव शरद सी
मन की बगिया में खिलती कलियाँ
आँखें चुलबुली कमर कली- सी
आकाशगंगा में झिलमिलाती
बिल्कुल मेरी परछाई लगी
रिसते ठंडे झरनों - सी सिहरन पा
दुबक गई शिव की बाँहों में
महक उठी क्यारी - क्यारी
गुलाब की पंखुड़ियों- सी
होठों पर स्मित मुस्कान लिए
जा पहुँची हृदय पटल पर
सर्द ठंडी रातों में
हिमालय की चादर में
उन बोझिल पलकों में
खामोशी के उन लम्हों में
एक - दूसरे में खो जाने की
दिल से एक हो जाने की
ललक जगाती आँखें।
उभरी टेढ़ी - मेढ़ी रेखाएंँ
एक चेहरे पर चेहरा तब
बर्फ से भरे हाथों को
अंजुरी में भर लेता
भाले तीर चलाता - सा
फिसल फिसल दम भरता।
ओ मेरी गोरी सखी! कालेपन में श्वेत लकीरों- सी
पवित्र, सत्य और शिव की प्यारी
त्रिशूल धारिणी
नवल धवल शिखरों से गिरती
निश्छल गंगा- सी
अर्द्ध नारीश्वर से
लिपट लिपट जाती
सिर से पैर
पैर से सिर तक
गहरे भावों में उतराती
आओ एकमेक हो फिर से
सृष्टि का निर्माण करें।
इन काली ठंडी रातों में
सूरज की उष्णता का संचार करें
मौन अंधेरे को चीर
एक नया अध्याय जोड़
गीत सुनहरे गाएँ
ओ काम ताप हरने वाली!
नए स्वर नए ताल छंदों में
प्रेम स्नेह की गंगा बहाएँ।
@वसुंधरा मिश्र, 29.12.2021
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