Wednesday, April 5, 2023
गाँधी और सरला देवी चौधरानी को पढ़ते हुए - बारह अध्याय - अलका सरावगी
गांँधी और सरला देवी चौधरानी - बारह अध्याय - अलका सरावगी को पढ़ते हुए - - -डॉ वसुंधरा मिश्र
प्रसिद्ध इतिहासकार और गाँधी विशेषज्ञ सुधीर चंद्रा ने "गाँधी और सरला देवी चौधरानी" उपन्यास के विषय में लिखा है कि ब्रह्मचर्य का व्रत ले चुके महामानव गाँधी और असाधारण सौंदर्य और प्रतिभा की धनी सरला देवी चौधरानी के बीच पनपे झंझावाती आकर्षण का जैसा बारीक मार्मिक संयत वर्णन यहाँ हुआ है, कहीं और नहीं मिलेगा।
पुस्तक स्त्री के स्वतंत्रचेता होने और सवाल उठाने पर उसे दरकिनार किए जाने की लंबी दास्तान है जो हमें इस उपन्यास के माध्यम से पुरुष सत्तात्मक समाज और उनकी मानसिकता को दर्शाती है।भले ही वह पुरुष अपने युग का महामानव ही क्यों न रहा हो।
इतिहास साक्षी रहा है ऐसी तमाम प्रतिभाशाली स्त्रियों का जिन्हें कोई नाम नहीं मिला सिर्फ हाशिए पर ढकेल दिया गया। उपन्यासकार अलका सरावगी ने स्वयं स्वीकार किया है कि यह केवल सरला देवी की नहीं, गांँधी की भी कथा है ।वे स्त्रियों को कैसे देखते थे, इसकी कथा है ।एक मनुष्य जीवन जीने के तरीके में, देश के लिए लड़ने में ,प्रेम करने में कैसे नैतिक हो सकता है, इसकी कथा है। सरला देवी चौधरानी और गांँधी पर लिखा यह उपन्यास राष्ट्रपिता महात्मा गांँधी के मन को एक साधारण व्यक्ति के रूप में देखने की भी जद्दोजहद है, साथ ही गांँधी के मन के निजी प्रेम के अनुभवों को सामने लाने का एक खूबसूरत प्रयास है।
गांँधी एक ओर सरला देवी को पूर्ण स्त्री के रूप में देखना चाहते थे परंतु दूसरी ओर देखा जाता है कि गांँधी के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाली स्त्रियों को भी समाज उचित स्थान नहीं दे पाता जो स्थान गांँधी जैसे पुरुष को मिलता है।
गांँधी को यदि एक सामान्य व्यक्ति के रूप में देखा जाए तो उनके ब्रह्मचर्य पर भी प्रश्न उठते रहे हैं जिसे वे अपनी सबसे बड़ी शक्ति मानते थे। तो क्या एक स्त्री जो शिक्षित, तेजस्वी और देश सेवा के लिए समर्पित है, वह अपने कार्यों को दक्षता से कर रही है, गांँधी के साथ उनकी बराबरी की सहयोगी बनी रही, वह भी साबरमती आश्रम में महादेव देसाई, राजगोपाल चारी जैसे प्रबुद्ध लोगों की आंँखों में खटकने लगी थी क्योंकि वह एक प्रबुद्ध स्त्री है।
गाँधी के साथ सरला की अंतरंगता उन्हें रास नहीं आई और तो और स्वयं गांँधी जो उसकी प्रतिभा के कायल थे वे भी कभी-कभी उसकी पूर्णता को लेकर प्रश्न उठाते रहे। सरला की सलाह को अनुचित बताते हुए अपनी बात को थोपने की जिद भी करते दिखाई पड़ते ।
उपन्यास के पृष्ठ 128 का यह प्रसंग - गाँधी के लिए सरला का बौद्धिक होना उनकी मित्रता का सबसे बड़ा सूत्र है।पृष्ठ 129 गाँधी उसकी राय को कोई स्त्री की राय की तरह नहीं देखते।जबकि वे उसे अपने बराबर का एक बौद्धिक मनुष्य मानते हैं।
पत्रों में गाँधी ने पूर्ण स्त्री, आत्मकेंद्रित स्त्री के रूप में सरला को विभिन्न हिदायतें भी दी हैं जो एक ओर सरला को गाँधी की कड़ी कसौटियों के कटघरे में खड़ा करतीं हैं तो दूसरी ओर उसके प्रति एक दमित वासना से भरे प्रेमी की तड़प भी दिखाई पड़ती है।?
पृष्ठ 132-133 पर जहाँ यह बात अधिक स्पष्ट होती है - जनक हो या गाँधी, मनुष्य के मन की गति एक गूढ़ रहस्य है। पिछली बार साबरमती में गाँधी के सिर में दर्द होने पर सरला ने उनका सिर दबाया था। कुछ देर बाद गाँधी ने अचानक अपना हाथ उसके हाथ पर रखकर पकड़ लिया। लगा, जैसे वे कुछ पशोपेश में हों कि क्या करें न करें? फिर उन्होंने तेजी से अपना हाथ खींच लिया और झटके से उठ बैठे। उन्होंने नींद का बहाना कर सरला को बाहर चले जाने को कहा। सरला को कुछ अजीब सा लगा था। वह उठकर चली गयी थी।
कभी सरला को 'प्यारी बहन सरला' से संबोधित( पृष्ठ 113) करते गाँधी पत्र के अंत में सरला का 'लॉ गिवर' (पृष्ठ 114) बताकर हस्ताक्षर करते ।
सरला जानती है कि समाज के बंधन अलग होते हैं और आत्मा का बंधन अलग। अपने पति पंडित रामभज दत्त चौधरी के साथ वह इस गहराई से कभी नहीं जुड़ पाई जैसे कि गाँधी के साथ।
रवीन्द्रनाथ टैगोर की भांजी और उपन्यासकार स्वर्णकुमारी देवी की बेटी सरला देवी चौधरानी आरंभ से ही अपनी मर्जी की स्वामिनी रहीं। साबरमती नदी के सूखे हुए तल में जब 3000 लोगों की सभा में सरला देवी का हिंदी में भाषण हुआ, गांँधीजी गुजराती में अनुवाद कर रहे थे। सरला के लिए यह बिल्कुल नया अनुभव था कि वह इतने लोगों के बीच एकदम नई जगह पर बोल रही थी। सरला देवी उस समय सैंतालीस साल की थीं और उनका पुत्र दीपक बारह साल का।
24 अक्टूबर 1919 का दिन लाहौर के लिए गाँधी का दिन था। लोग पंजाब की हालत जानना चाहते थे। छह महीने पहले हुए जलियांवाला कांड के कारण पंजाब के साथ पूरा देश उबल रहा था। अंत में, जब रामभज दत्त की कविता पंजाबी में और हिंदी में अनुवाद करके सुनाई तो साबरमती की गोद में बैठा जनसैलाब कई मिनट तक तालियांँ बजाता रहा। 'कदी नहीं हारना, साड्डी जान जावे।' हमारी जान भी चली जाए तो भी हम हार नहीं मानेंगे। इस सभा में गांँधी ने खुद को सरला का ऋणी बताया और उसको एक बहन की तरह माना लाहौर में उनके घर में रहे जिस तरह से अहमदाबाद में अनुसूया साराभाई मिलीं उसी प्रकार पंजाब में उन्हें सरला के रूप में एक बहन मिल गई है। बिना बहनों के आशीर्वाद के हिंदुस्तान आगे नहीं बढ़ सकता। (पृष्ठ 96)
सरला देवी बंगाल के गौरवशाली टैगोर परिवार और कलात्मक - सांस्कृतिक - साहित्यिक माहौल में पली-बढ़ी थी। उनका जीवन पंजाब में एक अलग तरह की ऊर्जा से भरा हुआ था। पर गांँधी उसके पंजाब के जीवन के बारे में बहुत कम कहते थे जबकि सरला पंजाब की गली गली जाकर स्त्री शिक्षा के लिए काम किया उनमें मुक्ति की चेतना जगाने का कार्य किया और अपने पति रामभज दत्त के साथ आर्य समाज और अखबार के कामों में में कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग देती रहीं। यह सब क्या नहीं लिखा जाना चाहिए?
शायद गांँधी के लिए सरला का बंगाल वाला जीवन ज्यादा अर्थवान है। पति की छाया में किए गए कार्यों का श्रेय पति के ही खाते में जमा हो जाता है। (पृष्ठ 97)
( पृष्ठ 184- 185) गांँधी एक ओर सरला को अपनी आध्यात्मिक पत्नी भी मानते हैं। दूसरी ओर गांँधी खुद लिखते हैं कि उनके बहुत से लोगों को सरला पर भरोसा नहीं है।
पुस्तक में बहुत सारे ऐसे प्रसंग है जिन से एक स्त्री सरला जो बहुत ताकतवर है बुद्धिमान है नेतृत्व क्षमता वाली है ।उसे पुरुषों के साम्राज्य में प्रवेश तो मिल जाता है लेकिन वह अपना स्थान उस स्तर का नहीं बना सकती जो वह बनाना चाहती है। भले ही सरला बंगाल की जॉन ऑफ आर्क दुर्गा काली का अवतार स्त्रियों का नेतृत्व करने वाली महिला रहीं हों। नमो हिंदुस्तान गांव सर्कल कंठ सर्कल भाषा में नमो हिंदुस्तान गाने वाली जिनका गीत हर दिल में एक लहर पैदा करता था जिसे सुनकर सब के रोए खड़े हो रहे थे ऐसी देश प्रेमी सरला जिन्होंने लाहौर से लेकर अहमदाबाद और पूरे देश में अपनी जगह बनाई थी।
बंकिमचंद्र द्वारा फरमाइश करने पर सरला ने उनके गीत साधेर तरणी को स्वरबद्ध करने का काम किया जो उनके जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि थी।भारत स्त्री महामंडल की स्थापना जिसका उद्देश्य था मनुस्मृति के पुरुषवादी नियमों से स्त्रियों को मुक्त करना ।जब गांँधी ने यह सब जाना तो वह हक्के बक्के रह गए ।यह स्त्री तो साक्षात शक्ति स्वरूपा है। भारत की हर स्त्री अगर ऐसी हो जाए तो देश के उद्धार में क्या देर हो। पृष्ठ8
यह उपन्यास सरला के हृदय से निकले एक स्त्री के उद्गारों का संकलन है जो एक प्रबुद्ध प्रतिभा की धनी देशभक्त, नेतृत्वकर्ता, पत्नी, माँ और भारतीय संस्कारों की पूर्णता लिए हुए है।
गांँधी सरला की पूरी कहानी सुनते हैं और बाद में ,उनके साथ उनका आंतरिक और आध्यात्मिक संबंध भी होता है।
गांँधी का हिंदी प्रेम,खादी पहनने-ओढ़ने का प्रचार-प्रसार और स्वयं भी उसका पालन करना आदि बहुत से प्रसंग हैं जहांँ गांँधी की सरला से बातचीत भी है और आमने सामने एवं पत्रों द्वारा दोनों की नोकझोंक भी है और सलाह- मशविरा भी है ,अपने सुख - दुख और आंतरिक पीड़ा, व्यथा इत्यादि को भी इंगित किया है।
सरला इस उपन्यास की नायिका हैं। वे अपने भीतर विद्रोही स्त्री को बंकिमचंद्र के उपन्यास की एक पात्र देवी चौधरानी में देखती हैं। सरला को लगता उनके सारे पढ़े हुए उपन्यासों के पात्र जीवन तो उनके आसपास आ खड़े हुए हैं। सरला के लिए वह एक अद्भुत अनुभव था।
गांँधी और सरला देवी चौधुरानी 12 अध्यायअलका सरावगी जी की बहुत ही अनूठी कृति है जिसमें गाँधी और सरला देवी चौधुरानी के गांँधी के साथ अंतरंग संबंधों और आपसी बातचीत को पत्रावली शैली द्वारा प्रस्तुत किया गया है।
भाषा सरल और सहज भाव लिए हुए है। कहीं कुछ दुराव या छिपाव नहीं है। गाँधी की मर्यादा को अक्षुण्ण रखते हुए यह उपन्यास खुलकर लिखा गया है, साथ ही भारतीय समाज के पुरुष सत्तात्मक पक्ष पर भी कुठाराघात किया गया है। गाँधी का यह चाहना कि वह अपनी नौकाएं जला दे और अपनी अक्लमंदी पर शक करना छोड़ दे। गाँधी बार बार कहते कि वह एक परिपक्व औरत के बजाय एक लड़की की तरह व्यवहार करती है। ठीक ही उसे एक शिक्षक की जरूरत है। - - - वे हर पत्र में उसे अपरिपक्व और तुक मिजाज़ बताने लग गए हैं सच ही है, कोई पुरुष स्त्री को अपने बराबर खड़ा हुआ नहीं देख सकता। गाँधी कोई अपवाद नहीं हैं। सरला ने ही उन्हें समझने में भूल की थी। (पृष्ठ 189)
गाँधी के बहुत करीब रहने वाली उनसे दूर होकर भी देश के स्वाधीनता यज्ञ में 'आहितग्निका' होने के लिए संकल्पबद्ध रहीं । स्वदेश और स्वदेशी के प्रति जिम्मेदार रहीं। सन् 1921 में इलाहाबाद के कांग्रेस अधिवेशन में सरला देवी सब - कमेटी की सदस्या के रूप में निर्वाचित हुई। गाँधी के असहयोग और अहिंसा पर 'भारती' पत्रिका में कई लेखों में अपने विचार लिखती रहीं।
पृष्ठ 211 में ये पंक्तियाँ वर्तमान समय में भी प्रासंगिक लगती हैं, " - अहिंसा के मंत्र के छल के भीतर हजारों नकली महात्माओं से देश भर जाएगा। इन अहिंसावादियों के अंदर सात ढक्कनों में बंद हिंसा जब - तब बाहर निकल आएगी और साथ ही जातीय चरित्र को निस्तेज, आलसी और स्फूर्तिहीन बना देगी। "
इस उपन्यास का शीर्षक अपनी कहानी खुद बयान करता है। भाषा की सहजता पूरे उपन्यास को अंत तक बांधे रखती है। आत्मकथन द्वारा पत्रावली शैली में सरला जैसी मजबूत और साहसी स्त्री सभी स्त्रियों की कहानी कहती नजर आती है। नये भारत के सपने देखने वाले तत्कालीन भारतीय समाज में भी स्त्री को प्रयोग के रूप में ही लाने का प्रचलन था, भले ही वह मुख्य धारा से जुड़ कर अपने कार्य कर रही हो। 12 अध्यायों में बंँटा यह उपन्यास गाँधी और सरला की अंतरंग बतकही है जिसे प्रतीकात्मक रूप से समझा जा सकता है। उपन्यास में गाँधी की कमियों में भी उनके सिद्धांतों को रेखांकित किया गया है जो देश के लिए सीख है। इसमें प्रशंसा, चापलूसी या बुराई को भी खुल कर प्रकट किया गया है।
प्रथम अध्याय 'आपकी हँसी तो इस देश की संपदा है' जो 24 अक्टूबर 1919 की बात है। दूसरा अध्याय है 'और आप क्या कर रहे थे 1895 में? ' ।तृतीय अध्याय है बंकिमचंद्र: तुम वही गाना गाओ सरला!, चतुर्थ अध्याय है 'मुझे भला कैलेनबैक से ईर्ष्या क्यों होगी?, पांँचवा अध्याय है'तुम सचमुच शक्ति हो, सरला! , छठा अध्याय है 'तुम गाँधी का तोता बन गई हो, सरला!, सातवाँ अध्याय है 'अब तुम्हारे बिना मेरा काम नहीं चल सकता!, 'आठवाँ अध्याय है' अब यह बिछुड़ना और अधिक कठिन लगने लगा है! नवांँ अध्याय है' प्रेम - गली संकरी होती है!', दसवांँ अध्याय' मैंने तो सोचा था कि तुम्हारे लिए आश्रम घर है या मैं ही तुम्हारा घर हूंँ', ग्यारहवाँ अध्याय 'मैं उसे अपने आध्यात्मिक पत्नी कहता हूंँ! 'बारहवाँ अध्याय' क्या तुम मेरी वैसी आध्यात्मिक पत्नी हो!, उपसंहार' सरला देवी - अविराम यात्रा एकला चलो रे। '
उपन्यास का कथानक प्रेम कथा पर आधारित है जो गाँधी और रवीन्द्रनाथ ठाकुर की भांजी सरला देवी चौधरानी से संबंधित है तो पाठक का ध्यान सहज ही आकर्षित हो जाता है। रहस्य के पर्दों को कौन नहीं जानना चाहता? उपन्यासकार अलका सरावगी ने इस नए विषय को उठाया है जो साहित्य जगत में चुनौतियों को आमंत्रण देता है। सृजन नए विचारों को जन्म देता है और नई कला की परतों को खोलने का काम करता है। इतिहास के निर्माण में अपने अध्याय बनाता है।
2023 में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित, मूल्य रु 299 और 216 पृष्ठों का यह उपन्यास हिंदी उपन्यासों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है और संग्रहणीय है।
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