Friday, April 22, 2022
छपते छपते हिंदी दैनिक कोलकाता के रविवारीय चिंतन पर टिप्पणी
आए दिन होते हैं मंदिर मस्जिद में झगड़े। आज इस बात को लेकर हम रामनवमी को रावणनवमी तक कहने के लिए मजबूर हो गए हैं।
बहुत ही महत्वपूर्ण और समसामयिक विषय हो गया है राम का नाम।भारतीय संस्कृति में कहीं भी धर्म जाति और रंग को लेकर कोई मतभेद नहीं किया गया था बाद में राजनीतिक रंग ने इन सभी मुद्दों पर अपनी-अपनी स्वार्थपरता के कारण तलवारें चलाई। अब भगवान के नाम राम को माध्यम बना कर नृशंसता का खेल चलाया जा रहा है। बुराई पर अच्छाई की जीत नहीं बुराई से अच्छे बनने की परंपरा चलाई जा रही है जो भारतीय संस्कृति के अनुरूप नहीं है। आपने निष्पक्ष विचार दिया है। हरिवंश राय बच्चन जी ने मधुशाला में स्पष्ट रूप से कहा है - - बजी न मंदिर में घड़ियाली, चढ़ी न प्रतिमा पर माला,
बैठा अपने भवन मुअज्ज़िन देकर मस्जिद में ताला,
लुटे ख़जाने नरपितयों के गिरीं गढ़ों की दीवारें,
रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला।।
बस यूंँ धर्म के नाम पर राम के नाम पर राजनीतिक कुर्सी के लिए अपनी-अपनी रोटी सेकने का काम कर रहे हैं। आम आदमी का कर्तव्य है कि वह अपनी आँखों पर पट्टी न बांधे। धन्यवाद - डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता
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