Monday, December 11, 2023
वह बिंदी कविता
वह बिंदी
उस बिंदिया से नज़र हटती ही न थी
बड़ी बड़ी गोल उषा की लाली सा रंग
बिखरी नहीं स्थिर गोल सुडोल
चेहरे की पहचान उस कविता की बड़ी बिंदी
नाद स्वर संगीत और नृत्य लय से पूर्ण
बिंदी उस आकर का प्रवेशद्वार लगा
लगा पूरी किताब पढ़ लो
अंनत संभावनाओं, आशाओं से भरी
सकारात्मक विचारों को व्यक्त करती
ध्यान में जाने लगी
अंतर्जाल की रेखाएं घेरने लगी
तंत्र मंत्र जप और तप की सीख देती वो बिंदी
प्रखर प्रचंड किरणों से अठखेलियाँ खेलती रही
कई कुंडलियों को धारण करती
कई चक्रों की घुमावदार सीढ़ियों पर चढ़ती
इड़ा पिंगला सुषमन-तार में फंसती रही
श्वास-प्रश्वास सावधान प्रहरी- सा
न जाने कहाँ खो गई थी
कविता ने अचानक मुझे
झकझोरते हुए कहा कहाँ खो गईं
मानो नींद से जगा दिया हो
खामोशी में भी कुछ अनकहा सा रह गया
उसकी बिंदी मुस्कुराती सी लगी
कविता की बिंदी का तेज उसकी आंखों में उतर आया था
वो कविता थी वो कविता थी
ध्यान अभी-अभी उस शीर्ष पर पहुंच गया था
जहां से सृष्टि का जन्म हुआ
न जाने कितनी ही गोलाकार रेखाओं से गुजरती रही
उनसे होकर अस्तित्व को ढूंँढती लगी
बिंदी सच में बिंदिया नहीं
स्वयं को पहचानने का एक मजबूत मार्ग है
@वसुंधरा मिश्र, 11.12.2023 (कविता की बिंदी)
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