Monday, December 11, 2023
चंद्र कला त्रिपाठी की टिप्पणी मन्नू भंडारी का कथा लोक
मन्नू भंडारी पर लिखा यह आलेख वर्तमान साहित्य में प्रकाशित हुआ था।
इसे यहां साझा कर रही हूं।
मन्नू भंडारी का कथा लोक-
एक कोटेशन से बात शुरु करना चाहती हूं । हालांकि यह एक बहुत पुराना संदर्भ है और तब से पुल के नीचे से बहुत पानी बह गया। इतना कि नदी का निशान तक नहीं है फिर भी मन्नू भंडारी और राजेंद्र यादव की साझा किताब 'एक इंच मुस्कान ' का बड़ा ही ज़िंदा प्रसंग यहां है । लिखा है राजेंद्र यादव ने।जिस किताब में यह है उसका नाम है ' 18 उपन्यास ' । अपने तरीक़े की बेहद विचारोत्तेजक क़िताब है। राजेन्द्र यादव के आधुनिक उपन्यासों से संबंधित
बड़े ही ज़हीन परिप्रेक्ष्य संपन्न लेख हैं इसमें।हर पन्ना आपको संदर्भित कुछ अनिवार्य पढ़ने की ओर ढ़केल देता है।इसी में एक रोचक आलेख ' एक इंच मुस्कान 'की रचना प्रक्रिया पर है। राजेन्द्र यादव के विट की ज़बरदस्त दख़ल तो है ही यहां साथ ही बड़े ही स्वाभाविक रंग में मन्नू भंडारी के रचना सरोकारों की झलक भी है। विनोद प्रियता में बसे हुए दोनों शरद देवड़ा के तगादों को झेलते हुए दिखते हैं। वे उनसे इतने आक्रांत हैं कि देवड़ा जी को पठान कहते हैं ।वे इन दोनों के सिर पर सवार होकर उपन्यास के हिस्सों की वसूली सी करते हैं। यही नहीं शरद देवड़ा मन्नू जी के हिस्सों के लिए पाठकों की प्रशंसा का ज़िक्र भी करते हैं जिसे लेकर राजेंद्र यादव अपने स्वाभाविक बिंदास विट और विनोद में दिखाई देते हैं और मन्नू भंडारी भी उसे समझती हैं।
जब इसे पढ़ा था तब मन्नू भंडारी की एक छवि मिली थी -' यही तो उसकी चाल है ।' मैं समझाता हूं , 'मेरे भीतर हीन भावना पैदा कर दो और तुम्हारी प्रशंसा करते रहो, उपन्यासांश समय पर मिलते रहेंगे...'
'कुढ़ो कुढ़ो ' मनु चढ़ाती है फिर सहसा सुस्त होकर कहती है 'लेकिन इस बार क्या होगा ? नौकर का अभी तक इंतज़ाम नहीं हुआ है ;आपसे इतना भी नहीं होता कि नौकर ही तलाश कर दो ।लीला बेचारी क्या क्या करें वह घर का काम करें तो बेबी? नया नया कॉलेज है, इन सबके बीच चैप्टर की बात उठती ही नहीं। मैं साफ कहती हूं जब तक रसोई में सिंक नहीं लगेगा मैं कुछ भी नहीं लिखूंगी'
इसी में यह भी है कि दोनों के बीच किरदारों को लेकर और पाठकीय प्रतिक्रिया को लेकर भी खूब सरस खींचतान चली है । वे अपने अपने लिखे जा रहे हिस्सों में अमला रंजना अमर के क्या क्या हश्र कर देने की बात करते हैं।
राजेन्द्र यादव कहते हैं - 'तुम्हारे पाठकों को कुशवाहा कांत पढ़ने की आदत है'
मगर स्वीकार करते हैं कि मन्नू भंडारी के लिखने में प्रवाह है , स्वाभाविकता है ।सायासता नहीं है ।
मन्नू भंडारी के त्वरित लिख डालने की बात भी यहां आई है।
ऐसे संदर्भ और इन्हीं से मिलते-जुलते लेखिका के कुछ साक्षात्कार और इधर दर्ज़ होती उनकी यादों के सिलसिले सब जैसे बहुत जुड़ कर उनकी जिस लेखकीय छवि को पूरा करते हैं उसमें सबसे ज़रुरी बात जीवन के अनुभवों से उनके रचनाकार का अविभाजित सा रिश्ता है। इस ज़िंदगी को वे उसमें सक्रिय बदलाव वाले तंतुओं को भी वे बहुत जुड़ कर उठाती हैं। रोज़मर्रा की इस ज़िंदगी में बरते हुए रंग हैं चमक है। उनके चुने हुए यथार्थ और मंतव्य को यह रंग ज़िंदगी से भर देता है।
मन्नू भंडारी की कहानियों में आए यथार्थ की जैविकी बड़ी प्रबल है।वह लेखिका को उसके भिन्न किस्म के रचनात्मक रुपांतरण का छूट नहीं देती। यहां तक कि लेखकीय सरोकार कथा के भीतर घुल कर मूल्य से अधिक मर्म का हिस्सा हो जाते हैं। मन्नू जी ने अपने रचनात्मक स्वभाव को समझा भी है।वे भारतीय परिवार में संबंधों की स्थिति या नियति देखते हुए उसमें ज़िंदा गर्माहटों के निकट बनी रहती हैं।'अकेली ' शीर्षक कहानी में वृद्धा का अकेलापन जिस सघन पारिवारिकता में उभरा है वह मुहल्ले वाले पास पड़ोस और नातेदारियों से गझिन ज़िंदगी में है। बुआ के जवान बेटे की मौत हो गई है।पति साधु होकर घर छोड़ चुके हैं मगर बीच बीच में चले भी आते हैं। दोनों के बीच राग अनुराग , एक दूसरे की रक्षा सुरक्षा जैसा कुछ नहीं है।बुआ में जांगर है। ज़रा सा मान देने पर अपनों से कहीं बढ़कर वहां खट उठती है।
मन्नू जी की शैली में कहानी काआरंभ यह है
सोमा बुआ बुढ़िया है
सोमा बुआ परित्यक्ता है
सोमा बुआ अकेली है
उसकी पूछ और उपेक्षा का गणित बदलता रहता है। लेखिका इस कर्मठ मानवीय दिल वाली उत्सव प्रिय वृद्धा के प्रति संवेदनहीन संबंधों की नृशंसता तो देखती है और कहानी को घनघोर उदासी में छोड़ देती है।इस कहानी में मन का टूट जाना आया है। मोहभंग नहीं और सोमा बुआ खंडित निर्वासित व्यक्तित्व नहीं हैं। उन्हें भावनात्मक झटका लगा है मगर उनके राग तंतु उन्हें टूटन में गर्क नहीं होने देते। मन्नू भंडारी की आरंभिक कहानियों में है यह कहानी। मगर उनके सरोकारों को दृढ़ता पूर्वक बता जाने वाली कहानी भी है।
नयी कहानी के दौर की अन्तर्कथा के संदर्भ तो अब ज्ञात हैं और राजेंद्र यादव मोहन राकेश और कमलेश्वर की योजनाबद्धता भी काफी कुछ ज़ाहिर है। मध्यवर्गीय अनुभव वादी रवैए का सबसे बड़ा हिस्सा इन तीनों के पास था।उसी समय पहली नयी कहानी के दावे और दांव भी चले थे।शहर बनाम गांव कथा का भी ज़ोर था। प्रेमचंद के बाद की पीढ़ी अपने अनुभव बोध और चिंतन की भिन्नता के हिसाब से एक वैविध्य मय विस्तृत और विशिष्ट यथार्थ के साथ सक्रिय थी मगर यथार्थ वादिता की लाउड घोषणा के बिना था यह।उसी लोकतांत्रिक ज़मीन से अज्ञेय रेणु अश्क यशपाल जैनैंद्र जैसे लेखक अपनी शैली में थे और नए नज़रिए के साथ थे।इस कड़ी में भीष्म साहनी अमरकांत मार्कंडेय शिवप्रसाद सिंह हुए। मन्नू भंडारी की पीढ़ी में निर्मल वर्मा भुवनेश्वर उषा प्रियवंदा कृष्णा सोबती हुईं। मन्नू जी के जीवनानुभवों के रचनात्मक चुनाव के संदर्भ में मुझे चंद्रकिरण सौनरेक्सा याद आईं। उनके यहां भी आदर्शवादी परिणतियों पर ज़ोर बहुत है और एक भावमयता है।जीवन की विसंगतियों और जटिलताओं के आलोचनात्मक विन्यास पर ध्यान नहीं है। मन्नू भंडारी अपने बहुत सादा शिल्प में इसे कर ले गईं हैं। उनके यहां यथार्थ बोध आदर्शवादी मूल्यों से दब कर नहीं आया।वे मुठभेड़ करती हैं। प्रयोग करती हैं। जैसे 'यही सच है' में या' मैं हार गई' में।
वे जटिलताओं को भी बहुत खोल कर निर्मित करती हैं। उनके ढ़ंग में विशिष्ट यह भी है कि बौद्धिक कलावादी तरीके का अमूर्तन नहीं है। त्रिशंकु देखिए , एक प्लेट सैलाब , स्त्री सुबोधिनी जैसी कहानियां व्यंग्य विदग्धता को बाहरी टूट फूट के प्रति उनके असंतोष मूलक आलोचनात्मक रवैए को व्यक्त करती हैं। औसत खाई अघाई ज़िंदगी सुविधाभोग छल और शहरी पन की फांके यहां दर्ज़ हैं।
इस तरह देखें तो मन्नू भंडारी का रचना संसार नयी कहानी के दौर में उभरता है । वे वहां एक मज़बूत और चर्चित उपस्थिति हैं।उसमें नयी कहानी के प्रचलित रचनात्मक मुहावरों के फार्मूलेशन नहीं हैं। उस दौर में नयी संवेदना 'और भाषा के संदर्भ में जिस अजनबीपन अलगाव और मोहभंग को आधुनिक मनुष्य के लिए नियति जैसी अनिवार्यता में दुहराया गया और कथ्य में उसकी बौद्धिक असंलग्न बुनावट दर्ज़ हुई , उससे मन्नू भंडारी की ज़मीन बहुत अलग थी।उसकी नवैयत भी कुछ ऐसी ही थी कि वह इस असर में आने वाली नहीं थी।
मन्नू भंडारी के लिए भी अनुभव की विश्वसनीयता का ज़ोर बड़ा तो था मगर उनके यहां रचना के लिए अनुभवों का संश्लेषण जिस लेखकीय निकटता में हो रहा था उसमें वस्तुनिष्ठता अलग नवैयत में थी।
निम्न मध्यवर्गीय घर और समाज के आत्मीय प्रसंगों से उभरती ये कथाएं आधुनिक मनुष्य के द्वन्द्व को नज़दीकी स्पर्श में रच देती हैं। यह इतना संप्रेष्य और संवादी है कि मन्नू भंडारी के पाठकों तक जीवंतता में पहुचा है। यहां उनकी आरंभिक कहानियों के कथ्य तो याद आते ही हैं , उनकी 'यही सच है '
आपका बंटी ' में पति पत्नी के बीच पसरे तनाव और टूटे हुए दांपत्य के असर को मन्नू भंडारी ने बंटी की तरफ से देखना तय किया था। मुझे याद है कि तब मैं उस स्त्री को अधिक ज़िम्मेदार मानने के लेखिका के रवैए से असंतुष्ट भी हुई थी । मुझे लगा था दांपत्य में जवाबदेही के हिस्से को मन्नू जी औरत के लिए जिस तरह से तय कर रही हैं वह आधुनिक दृष्टि नहीं है।उस उपन्यास को पढ़ाते हुए भी मैंने उस स्थापना से अपनी असहमति का हमेशा संदर्भ लिया।
आपका बंटी में आया जीवन संदर्भ मोहन राकेश के दांपत्य से संबंधित था और मोहन राकेश के अपने उपन्यास में अंधेरे बंद कमरे में भी थोड़ी अमूर्तता के साथ भिन्न ढ़ंग के निलिशों में लिपटी स्त्री महत्वाकांक्षा को निशाने पर लेने वाली वह बात मौजूद है।ये दोनों किताबें मिला कर पढ़ी जाएं और टोह भी ली जाए तो कुछ विमर्शों को आसानी मिल सके शायद मगर इसके बावज़ूद मुझे मन्नू भंडारी की कथा कला ने बहुत प्रभावित किया। मेरे लिए भी उन्हें समझने का एकमात्र संदर्भ ' आपका बंटी' तो हुआ नहीं । हमारी पढ़ने लिखने की दुनिया की वह बेहद प्रिय लेखिका थीं जिनकी किताबों को शेल्फ में देखते ही हम खींच लेते थे। एक और चीज़ जो मुझे मन्नू भंडारी के संदर्भ से याद आ रही है वह यह है कि शायद ही कभी राजेंद्र यादव के लेखकीय तरीक़े से मिला कर एक तुलनात्मक आयाम लेकर मैंने उन्हें पढ़ा हो। उन्हें पढ़ते हुए राजेंद्र यादव के पैटर्न कथा को निर्मम बेलाग अलिप्तता में रचने वाले कभी याद नहीं आए।वे एक भिन्न आस्वाद के प्रस्ताव में थे। बल्कि अपनी तिकड़ी में ऐसी सायास लगती अतिरिक्त सी विदेशी किस्म की बौद्धिकता में सबसे ज़्यादा थे। पाठक की आसानियां उनके यहां सबसे कम थीं।
न चाहते हुए भी यहां एक तुलना जैसा कुछ हो ही गया मगर मैं शायद यह कहना चाहती हूं कि मन्नू भंडारी ने अपने लेखक पति के अत्याधुनिक पैटर्न वाले ढ़ंग से अप्रभावित रहते हुए अपना एक आत्मीय संलग्नता वाला शिल्प विकसित किया । यही नहीं बल्कि अपने लिखे में राजेंद्र जी के हस्तक्षेप के लिए कोई फांक नहीं छोड़ी।
'एक कहानी यह भी ' में कई संदर्भ हैं जो उनकी रचनात्मक बुनियाद और प्रवृत्ति के बारे में बताते हैं। जैसे उन्होंने वहीं थोड़ी तल्खी के साथ खुद के लेखन के लिए शरच्चंद्रीय भावुकतामय कहे जाने का जवाब सा दिया है । ऐसे ही आवेग में कहा है कि ' अब कोई चाहे तो मेरे इस बांधने डुबाने को औरताना भावुकता के खाने में डाल कर खारिज कर सकता है'
ऐसा लगता है कि उनके लेखन की आलोचना का यह भी एक परिप्रेक्ष्य था जो उन्हें आहत करता था। वे बौद्धिक निस्संगता की उस बुनावट में नहीं हो सकती थीं जो निर्मम भी हो जाती है। उन्हें मर्म प्रभावित भर नहीं करते थे बल्कि उनकी आंतरिकता का हिस्सा हो जाते थे। संभवतः इसीलिए वे इंटेंस जीवनानुभव लिख पाईं।ऐसे कि जिन्होंने पाठकों की स्मृति में घर भर नहीं बनाया बल्कि जीवन के विस्तृत आयामों के प्रति संवेदनशीलता का निर्माण किया। मार्मिकता और एक मनुष्य की पीड़ा के प्रति सचेत जवाबदेही का पक्ष मन्नू भंडारी के लिए ज़रुरी हुआ है।यह उनकी मूल्यचेतना का बड़ा स्पष्ट आधार है। अपनी कहानियों और उपन्यासों में सामाजिक विसंगतियों से अधिक वे विडंबनाओं के भीतर प्रवेश करती हैं और एक गहन आंतरिक संसार रचती हैं जिससे सामाजिक टकराहट के अर्थ गहरी निबद्धता में ज़ाहिर होते हैं। एक व्यक्त संसार है यह।अमूर्तन नहीं है। मध्यवर्गीय जीवन की नब्ज़ रही है लेखिका की पकड़ में। प्रायः यही है और उसमें बसी हुई संवेदनहीनता पाखंड व्यक्तित्व विभाजन और अलगाव को भी वह बौद्धिक रवायतों में नहीं उभारतीं। इसलिए वे इतनी बेधक हैं कि वह पूरा प्रदर्शन दो टूक ढ़ंग से सामने आ जाता है।बल्कि कहें कि उघड़ जाता है।
मुझे उनकी ' त्रिशंकु ' शीर्षक कहानी ने बड़े अलग ढ़ंग से प्रभावित किया था। बल्कि वह अनायास मेरे निजी बोध से जाकर जुड़ गया था। मैं कुछ सालों तक विश्वविद्यालय में महिला छात्रावास के प्रशासन से भी जुड़ी थी।उन दिनों मुझे एक बड़ा ही अजीब अनुभव हुआ था। विश्वविद्यालय में बनारस के आसपास के दूर दराज के भी गांवों से छात्र छात्राएं पढ़ने आते हैं। गांवों से आई लड़कियां आरंभ में अपने रहन सहन में गंवई सादगी में बड़ी अचकचाई संभ्रमित सी दिखती हैं।उन दिनों रैगिंग ऐसी छिपी हुई कार्रवाई होती कि उस पर रोक लगाने के लिए हमें बड़े पापड़ बेलने पड़ते। ख़ासकर इन छात्राओं की रक्षा टेढ़ा मामला हुआ करता।
कुछ दिन बीतते न बीतते वे छात्राएं अपनी नितांत फैशनेबल धज में रुपांतरित मिलतीं।सब कुछ तेज़ी से बदलता था।हम इसे कौतुक की तरह देखते। किसी को क्या आपत्ति होनी थी।
उनके घर वालों के लिए भी यह रुपांतरण प्रीतिकर ही था। उन्हें यह आधुनिक होना लगता था।
हुआ क्या कि उन्ही के बीच की एक लड़की ने कविताओं के पोस्टर बना कर मुख्य फाटक के निकट चिपकाने शुरु किए जिन पर प्रशासन का ध्यान जाने लगा।वह छात्रा विश्वविद्यालय में आंदोलन परक गतिविधियों में सक्रिय थी और अकेली नहीं थी। उसके साथ ऐसी चेतना से लैस कई छात्राएं थीं। हॉस्टल में नए तरीके की गतिविधियां जारी हो गईं और कई गोष्ठियां हुआ करतीं। विश्वविद्यालय के अन्य विभागों से संवाद बहस के लिए विद्वान आमंत्रित होते और यह छात्रावास प्रशासन के संज्ञान में ही होता था। सांस्कृतिक गतिविधियां भी थीं।
धीरे धीरे उन्हें कुछ और भनक लगी।
मुझसे कहा गया कि उन्हें वैसे पोस्टर लगाने से रोका जाए और न माने तो उनके अभिभावकों को बुलाया जाए।
मुझे लगा कि छात्राओं के अतिरिक्त फैशन और भिन्न अराजकता में मुब्तिला होने से बहुत सारे संकट आने के बावजूद उसकी नोटिस कभी नहीं ली गई मगर जब वे अपने स्वतंत्र जागरुक प्रतिरोध को सामने लाना चाहती हैं जो शिक्षा का एक बड़ा उद्देश्य है तब उन पर रोक लगाने की बात आ रही है।
मैंने त्रिशंकु रचने वाले सामाजिक विधान को बड़े तीखेपन के साथ अनुभव किया था और मन्नू भंडारी नज़दीक आ गईं थीं। वे आयरनी को रचती हुई किसी अतिरिक्त दार्शनिकता में कभी नहीं गईं। यह उनका पथ नहीं था।
वे अपने पाठकों तक सीधे आत्मीय रास्ते से पहुंची हैं।
कला में मर्म की इंटेंसिटी रचने के विधान को रोमेंटिक पिछड़ा हुआ मूल्य मान लिया गया था।
अपने साहित्य के लिए ऐसे तमाम जजमेंट का आभास था मन्नू जी को। अपने आत्मकथ्थ में कहीं कहीं वे इसका सामना करती दिखाई देती हैं।
मन्नू भंडारी के लिए सामाजिक यथार्थ और उसका वृहत्तर ऐतिहासिक संदर्भ अनुपस्थित नहीं था।महाभोज जैसा उपन्यास लिखते हुए उन्होंने सत्ता की आपराधिक जटिलताओं को जैसे उधेड़ा है वह अद्भुत है। मैंने इस उपन्यास पर लिखा भी। मुझे उनकी ऐसी नवैयत ने बहुत चकित किया था।लेखन की यह नई ज़मीन ही नहीं थी बल्कि यह तो एक बीहड़ भी था। और उसके भीतर इस सारे क्षरण को पहचानती हुई बेधक दृष्टि जिसे वहां उस अर्थ को मार्मिकता में रचना याद रहा था। बड़ी बेचैन कर देने वाली कथा है वह।
मन्नू भंडारी ने रचनाशीलता को मानवीय सरोकारों से जोड़ने बांधने का कोई सायास उपक्रम नहीं किया है बल्कि यह उनके व्यक्तित्व से अविभाज्य एक गुण है। विडंबना है कि इसने ही उन्हें बड़ी ही कठिन पीड़ा भी दी है।
'एक कहानी यह भी' पर लिखते हुए मैं आलोचनात्मक भी हुई थी क्यों कि मैं भी अपनी तटस्थ अन्तर्भेदी दृष्टि के लिए संघर्ष में थी और एक सामान्य स्त्री की तरह पति पुरुष से अपेक्षा का पहलू मुझे कमज़ोर लगा था मगर मानती हूं कि यह मेरा अर्थ को आधा देखना था और स्त्री विमर्श के सूखे हिस्सों की चपेट में होना था।
मन्नू भंडारी देश के उस दौर की सचेत निर्मित थीं जिसके लिए आदर्श किताबी नहीं थे। अपने जीवन में बहुत दूर तक उसे घुला कर चलीं वे।अभी जो स्मृति चित्र उनके निधन के उपरांत पढ़ने को मिल रहे हैं , गरिमा श्रीवास्तव का लिखा , कविता का लिखा और सुधा अरोरा जी का लिखा भी जिसे मिला कर पढ़ने का मन कर रहा है। उसमें एक कठिन दुख से हारते चले जाने वाले मन और शरीर का पता है ।
गरिमा जी ने अपनी जिस आख़िरी मुलाक़ात का ज़िक्र किया है जिसमें वे कहती हैं मुझे लिखना सिखा दो। उनकी पीड़ा में सबसे गहरे न लिख पाने की पीड़ा है। गरिमा ने जैसे उस छटपटाते स्पर्श को अपनी हथेली में बसा लिया है और स्नायु रोग के साथ जड़ी पीड़ाओं का जो पहाड़ है उसका अनलिखा भी सब , उसे जानने के बाद कैसे उस असर से बचा जाए।
स्त्री की स्वाधीन ख़ुद मुख़्तार शख्सियत रोबोट नहीं हो सकती।हर तरह का समाज स्त्री की संवेदनशीलता के छोर से उसके भावनात्मक दोहन में प्रवृत्त होता है।
अगले किन्हीं ज़मानों में शायद कुछ उलट पुलट हो। जब तक नहीं है तब तक तो यह हाकिम बड़ा कड़ा है और हज़ार मुहों से बोलता है। मज़ेदार है कि एक मुंह बड़ा लोकतांत्रिक भी है जिसके पास यथार्थवादिता का निष्करुण दावा है।
मन्नू भंडारी ने कहीं अपना सुख संतोष लिखा है, वह है निर्कुंठ सहज मैत्री और सच्चा संग साथ। विश्वास को उन्होंने अपरिहार्य जीवन-मूल्य माना और विश्वासघात को सबसे बड़ा अपराध। अपनी पीड़ा को उन्होंने खंडित विश्वासों की व्यथा कहा है। उससे विलग होकर जीने की आत्मपर्याप्तता थी उनके आत्मसंघर्ष में।वे जीवनी शक्ति पर भरोसा भी करती थीं। जुड़े हुए सुंदर मैत्री पूर्ण संसार में जब तक संज्ञानता रही रच बस कर रहीं।
हम तक वह सुंदरता आती रहेगी।
चंद्रकला त्रिपाठी
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