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Wednesday, January 4, 2023

ऐ वर्ष 23 (कविता)

ऐ वर्ष 23 तुझमें कुछ ख़ास नहीं ये तो पिटारा है पिछले हिसाब का वही सुबह वही दिन वही रात फिर वही रोज़ के काम ऐ वर्ष 23 मत कर गुमान ये तो बदले कैलंडर में फिर से दोहराने के दिन हैं ऐ वर्ष 23 मत रह अंजान सोमवार हो या रविवार आदमी के अपने पैमाने हैं तुम सिर्फ नंबर हो ऐ वर्ष 23 कुछ लोग पैदा होते हैं कुछ अपनी उम्र गिनते हैं कुछ मरते हैं यूँ ही तुम भी आगे बढ़ते हो ऐ वर्ष 23 लोग खुशियाँ मनाते हैं गमों से दूर एक रात को गुलज़ार करते हैं तुम इस साल की तरह फिर आना @वसुंधरा मिश्र, 1.1.23

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