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Wednesday, January 4, 2023

साहित्यिकी संस्था मधुपुर आबाद रहे - जलते दीप जोधपुर एडिशन में फिर रिपोर्ट लिखी

साहित्यिकी संस्था ने काव्य संग्रह 'मधुपुर आबाद रहे' पर चर्चा - - कोलकाता की प्रसिद्ध संस्था साहित्यिकी ने लेखिका और साहित्यकार डॉ गीता दूबे के प्रथम काव्य संग्रह 'मधुपुर आबाद रहे' पर चर्चा रखी। इस कार्यक्रम में कोलकाता के विशिष्ट साहित्यकारों, कवि और आलोचकों ने अपने वक्तव्य रखे। इसका आयोजन जनसंसार सभागार में किया गया ।परिचर्चा आरंभ होने के पूर्व जनसंसार के संस्थापक तथा दिवंगत लेखक पत्रकार गीतेश शर्मा को बड़ी शिद्दत से याद किया गया जिनके सानिध्य में नियमित विचार गोष्ठियों हुआ करती थीं। साहित्यिकी की सचिव डॉ मंजू रानी गुप्ता ने कार्यक्रम का संचालन करते हुए गीता दूबे की कविताओं में बहुआयामी परिदृश्य का जिक्र किया और शुभकामनाएँ दी। बबिता मांधडा़ ने मधुपुर आबाद रहे संग्रह की कुछ कविताओं का पाठ किया। परिचर्चा में भाग लेते हुए मुख्य वक्ता के तौर पर उपस्थित प्रख्यात आलोचक डॉ अरुण होता ने काव्य संग्रह पर अपना वक्तव्य देते हुए कहा कि इस संग्रह की कविताएँ स्व से ऊपर उठ कर पर की संवेदना को मुखरित करते हुए अपने समय की बड़ी चिंताओं और समस्याओं को विभिन्न बिंबों और भाव बोध के साथ व्यक्त करती हैं। स्त्री संवेदना, प्रेम, पर्यावरण, भूमंडलीकरण, प्रकृति- सौंदर्य, विवाह, कोरोना काल आदि कविताएँ शिल्प और विषय के स्तर पर विविधता लिए हैं। जानी मानी समीक्षक और शिक्षाविद् डॉ इतु सिंह ने गीता दूबे की कविताओं की समीक्षा करते हुए कहा कि इस संग्रह में नारी जीवन के संघर्ष और अनुभव के अलावा जिस तत्व ने मुझे सबसे ज़्यादा आकर्षित किया,वह प्रेम है। परंतु उस पर कहीं पर्दा पड़ा है, उन कविताओं का दरवाज़ा जाने कब खुलेगा। डॉ गीता की कविताएँ अंतर्जगत की अपेक्षा बहिर्जगत के आवेग ज़्यादा हैं, जो उन्हें व्यथित करती हैं। कवयित्री की छोटी कविताएँ अल्प शब्दों में ही बहुत कुछ कह जाती हैं। देर तक पाठक को स्पंदित करती रहती हैं। यह उनकी छोटी कविताओं का जादू है। वरिष्ठ कवि पत्रकार रावेल पुष्प ने कहा कि गीता की अधिकतर कविताएँ नारी मन की व्यथा का इज़हार करती हैं और वे रूमानियत के प्रतीक चांद की चाहत नहीं करतीं बल्कि तपते हुए सूरज को मांगती हैं जिसकी तेज रोशनी में वे तपकर निखर सकें। बाबूलाल शर्मा,शंभुनाथ, आशुतोष सिंह, विजय गौड़ ने भी गीता दुबे के काव्य संकलन की कविताओं की विविधता के साथ उनके विभिन्न साहित्यिक पहलुओं पर प्रकाश डाला । कवयित्री गीता दूबे ने अपनी सृजनात्मक यात्रा के विभिन्न पड़ावों का जिक्र करते हुए कहा कि कविताएँ उनकी सखी की तरह हैं जिनसे वे अपने मन की बातें दिल खोलकर बखूबी कर सकती हैं। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में वरिष्ठ लेखिका रेणु गौरीसरिया ने पुनरावृत्ति से बचते हुए कहा कि गीता की कविताओं में प्रेम का शाश्वत अद्भुत राग सर्वत्र बिखरा हुआ है। धर्म, राजनीति और समाज में व्याप्त विद्रूपताएँ और विसंगतियों से उपजी कचोट उनकी कविताओं में स्पष्ट झलकती है। इस परिचर्चा में कोलकाता के साहित्य, समाज और संस्कृति क्षेत्र के प्रमुख विद्वानों की उपस्थिति उपस्थिति रही। श्री शैलेन्द्र,शर्मिला बोहरा जालान, उमा झुनझुनवाला, प्रेम कपूर, सुषमा हंस, सुषमा त्रिपाठी, सूफ़िया यास्मीन, दुर्गा व्यास, अनिता ठाकुर, प्रमिला धूपिया, नमिता जायसवाल, सरिता बेंगानी, चंदा सिंह, कविता कोठारी, अल्पना नायक, रचना पांडेय, प्रीति सिंघी, लिली शाह, सत्य प्रकाश तिवारी, रोहित राम, विशाल सिंह, पूर्ति खंडूरी, महेन्द्र नारायण पंकज, शाहिद फरोगी, सेराज खान बातिश, प्रभाकर चतुर्वेदी आदि ने सक्रिय भाग लिया। काव्य संग्रह मधुपुर आबाद रहे की परिचर्चा के बहाने तथा अच्छी उपस्थिति से जन संसार सभागार एक बार फिर गुलजार हो गया।यह जानकारी वरिष्ठ पत्रकार रावेल पुष्प ने दी । संलग्न चित्र: मधुपुर आबाद रहे पर हुई परिचर्चा में शामिल लेखक तथा विशिष्ट श्रोता. प्रेषक: रावेल पुष्प वरिष्ठ पत्रकार कोलकाता 94341 98898

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