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Wednesday, January 4, 2023

कुहासा (कविता)

कुहासा इस कुहासे में मानो जिंदगी ठहर गई है कुछ करने की ललक जकड़ी सी रह गई है ऐसे तो जिंदगी भर कुछ न कर पाए कुहासे को देख लगा ऐसे ही एक आवरण से ढके रह जाएंगे क्त कुछ रोशनीरोशनी कुछ अंधेरे कुछ भ्रम और कुछ वहम इन्हीं को ओढ़े बस सोचते रह जाएंगे। - @वसुंधरा मिश्र, 26.12.22

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