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Wednesday, January 4, 2023

विनती हे वाग्देवी! तुमसे (कविता)

विनती हे वाग्देवी! विनती हे वाग्देवी! तुमसे सबकी जिह्वा पर विराजो सुमति कुमति में भेद करके वाणीश्री का पथ दिखलाओ । अमृत भारती , जगतवाहिनी स्वर, व्यंजन तुमसे ही उद्भिद विद्यादायिनी बुद्धि दात्री काव्य गीत से महिमामंडित मानव में सद्भाव भरो विनती हे वाग्देवी! तुमसे नव गति, नव लय, ताल छंद नव नृत्य, संगीत तुम्हीं से निःसृत हर युग का विकास तुम्हीं हो श्वेतपद्मासना हे जगजननी ! जीवन को ऊर्जा से भर दो विनती हे वाग्देवी! तुमसे हंस आरूढ़ वीणावादिनी नीर - क्षीर- विवेक समझाती कला, साहित्य, संस्कृति में निहित देश, विश्व, परिवार जोड़ती हर घर को जगमग कर दो विनती हे वाग्देवी! तुमसे प्रेम, बुद्धि, विद्या की देवी चिंतन-मनन जगत् को देती काट अनीति, अराजकता के बंध तमसोर्माज्योतिर्गमय की धारा बन जीवन ऊर्ध्व गामी कर दो विनती हे वाग्देवी! तुमसे @डॉ वसुंधरा मिश्र ,कोलकाता दिनांक :12.12.2022

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