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Saturday, August 5, 2023

वाह मणिपुर! धिक्कार कविता

वाह मणिपुर! धिक्कार कौन सी दुनिया में जी रहे हो मणिपुर! धिक्कार तुम्हारा यह सुंदर नाम राजघराने - सा नाम और अत्याचारियों - सा काम दो स्त्रियों को नंगा कर अश्लीलता को भी किया शर्मसार देश और विदेश के संस्कार भी आज हुए बेहाल माँ बहन बेटी भाभी चाची मामी नानी दादी की देह से पोषित पुरुष का अंत समय आता दिखता है कौन सी दुनिया में जी रहे हो मणिपुर! धिक्कार है समय के साथ लगता है भुला दी गई वह द्रोपदी जिसने उखाड़ फेंके थे पुरुषों की कामुकता भरी कड़ी को आत्मसम्मान और शील के समक्ष नहीं टेके थे घुटने धृतराष्ट्र, दुर्योधन और कौरव समूह को चटा दिया था धूल स्त्री जाति की मर्यादा को स्थापित कर अस्तित्व की लडी़ लड़ाई थी कौन सी दुनिया में जी रहे हो मणिपुर! धिक्कार है युगों युगों से देख रही है स्त्री अपनी कहानी फिर कही न कहीं सुलग रही है फिर वही कहानी कथाएँ झूठ नहीं बोलती हैं कल्पना में नहीं जीती हैं वे मूर्त रूप लेकर समय-समय पर पाठ पढ़ाने आती हैं कौन सी दुनिया में जी रहे हो मणिपुर! धिक्कार है स्त्री को हर बार मोहरा बनाया गया है घर बाहर दोनों ही जगह प्रताड़ित की जाती रही हैं कामुक लोभी पुरुषों के विनाश का युग वह दिन अब ज्यादा दिन दूर नहीं है समय माफ नहीं करता है पहिया चलता रहता है कौन सी दुनिया में जी रहे हो मणिपुर! धिक्कार है अब दुर्गा लाने का समय आ गया है धर्म की हानि होने पर देवी अवतार लेने वाली हैं कलियुगी महिषासुरों का विनाश कर अब सुधार लाना है ऐसे कृतघ्न पुरुषों से धरती खाली हो जाएगी आने वाले युग में स्त्री के शासन में स्त्री-पुरुष दोनों की ही सत्ता फिर से एक सुंदर और सफल राज बनाएगी। 21.7.23, डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता

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