Powered By Blogger

Wednesday, August 9, 2023

कविता मोर याद आते हैं

मोर याद आते हैं - - - वारिश की झमाझम बूंदों के बीच मोर याद आते हैं गाँव की पगडंडियों पर मोर पंख बुहारते - नाचते रहते नीम का पेड़ और नीचे गिरी निमोली भी मीठी मीठी कीकर के कांटों पे रेत के टीले पार करते मोर याद आते हैं बजरंगबली के मंदिर के पास ऊंचे चबूतरे पर पंखों को खोल मोहक ओढनी में सजे मोर याद आते हैं बरगद और पीपल की गलबहियाँ से सजी डालों पर एक दूसरे से सटकर बैठे मोर याद आते हैं रेत की अनगढ़ सड़कों पर एक दूसरे के पीछे दौड़ते भागते याद आते हैं नोहरे की दहलीज पर उसका सतरंगी पंखों का खिलखिलाना याद आता है एक थाली में रोटी के टुकड़े पर हक़ जताना याद आता है पीपल के पेड़ की हर शाखाओं से उस खुशबू हवा का सरसराना याद आता है सांँझ के धुँधलके में मोरों का सिमट जाना याद आता है कुंँए के गहरे पानी में छपाक की आवाज उभर कर आई थी नई घाघरा चुनड़ी की छाप साक्ष्य बने थे मोर उस काली रात के पीऊ पीऊ से गूंँज उठा था सन्नाटे से भरा गाँव हाथों के कंगन और चुडियों की खनखन हो गई थीं मौन आज भी याद आते हैं वे कंगूरे जो सोने से मढे़ थे हवेलियों की दिवारों में चुनी आत्माओं की चीखें खामोश थीं गाँव की पगडंडियों पर मोर दम तोड़ रहे थे गेहूंँ और बाजरे के लहलहाते खेतों का सोंधापन मरने लगा था पैरों के नीचे से रेत के टीले धंसने लगे थे समय की आँधी में मोर के पंख मुरझाने लगे थे पीपल की कई डालें सूखने लगी थीं पीऊ की ध्वनि कम होती जा रही है गाँव शहरों की चकाचौंध में खोते जा रहे हैं रेत के टीलों पर पत्थरों के मकान खड़े हो गए हैं ऊपरी धरती ऊर्जा से भरी दिखती है अंदर के खोखलेपन में हर आदमी धंसा जा रहा है मोर पंख के नकली कारखाने असली लगने लगे हैं मोर मरने लगे हैं आदमी भी मरने लगा है कभी-कभी मोर याद आते हैं वे भाव कभी-कभी जीवित हो उठते हैं आशा के बीज उगते हैं मर नहीं सकते मोर मोर हमेशा हमारे भीतर जीवित है

No comments:

Post a Comment