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Sunday, August 6, 2023

कविता बावरा हुआ ये मन

बावरा हुआ ये मन देखे ज्यूं चातक बन बूंदों की चाहत में ढूँढता कुछ और ही मन बादलों के बीच कोई घर खिड़की दरवाजे सा लगा पानी बिजली से लैस नए नए आकार बनते नीचे से ऊपर सीढ़ी सी आर पार करते-करते आंखें थक जाती रास्ते खो जाते मायावी और रहस्यमयी सी बादलों के बीच कोई घर भला कोई कब टिक सका एक ऐसा रास्ता भी बना बड़े बड़े पर्वत और कंदराओं के झुंड स्वर्ग द्वार हो जैसा जंगल के जंगल पशु जानवर एक डोर में बंधें नदियों के लाखों किनारे वृक्षों पर झूलते अनगिनत बादलों के सजे टुकड़े धूप से चमकते क्रिस्टल रंग बिरंगी इंद्रधनुषी समां न जाने किस कवि की कल्पना किताबों के पन्ने ही पन्ने खुलते चले गए अप्सराओं से भरी इंद्र सभा के मोहक दृश्य हल्के हल्के बादलों के बीच रूई के फाहे सी हवा उड़ती लगी अरे! सब कहाँ उड़ गए धीरे धीरे एक के बाद एक बने बनाए घरों की दिवारें गायब होने लगीं ढहने लगा था सपनों का यह आलीशान शहर समझता ही नहीं मन बड़ा ही बावरा हुआ जाता है उड़ने लगा फिर किसी मायावी बादलों की तलाश में

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