Sunday, August 6, 2023
कविता होंगे हजारों सितारे
होंगे हजारों सितारे तुम्हारे आस्मां में
जमीं पे भी नहीं हैं कम चमकते सितारे
चांद की चांदनी में चेहरा धुंधला सा लगा
उषा की बिखरी-बिखरी लाली
बालों में छिपे अलग से लगे
हवा के रुख में बहती जा रहीं ये नदियां
बंधनों से मुक्त होने की चाहत में भागती-दौड़ती
जल के भीतर ही भीतर जल में ढूंढती रास्ते
पर्वतों की बनावट को भी काटती
कुछ और ही आकार में ढालती रहती
झरने झील और नालों को गढ़ती लगीं
हम कितने अंजान रहे प्रकृति के रहस्यों से
सभी अपनी जीविका में जीवित लगे
मस्तिष्क की अंधेरी गुफाओं में जाल बुनने लगे
प्रकृति की आँखों में धूल झोंकते रहे
प्रेम और करुणा को नकारते हुए
रहस्यमयी को नजरअंदाज करते रहे
नफरत और क्रोध को हवा देते रहे
डॉ वसुंधरा मिश्र
12 जुलाई 2023
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