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Saturday, March 4, 2023

लेखन उड़ने के लिए नहीं है -डॉ अल्पना मिश्र - - हिंदी कथा जगत की प्रमुख हस्ताक्षर अल्पना मिश्र

लेखन उड़ने के लिए नहीं है - - - हिंदी कथा जगत की प्रमुख हस्ताक्षर अल्पना मिश्र का जन्म 18 मई को 1969 आजमगढ़, उत्तर प्रदेश में हुआ। हिंदी के मनीषी आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के परिवार में जन्म होना आपका सौभाग्य रहा जहां आंखें खुलते ही किताबों में घिरी रहीं । यही कारण रहा कि परिवेश, अनुशासन, तर्क - बहस और सीखने की बैचेनी मिली। प्रतिभा की धनी कथाकार डॉ अल्पना मिश्र ने महज कम उम्र में ही कहानीकार और उपन्यासकार के रूप में हिंदी कथा साहित्य को नये आयाम दिए। हिंदी में आपको "अनकन्वेंशनल राईटर" माना गया। गोरखपुर विश्विद्यालय से हिंदी में एम. ए., बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पी-एच. डी की शिक्षा प्राप्त डॉ मिश्र कई बड़े साहित्यकारों की छाया में पलीं। भाषा की ताजगी, विलक्षणता और लेखन में लोकरंग की उपस्थिति उनके लेखन को अलग पहचान देते हैं। 'भीतर का वक्त' ,'छावनी में बेघर' , 'कब्र भी कैद और जंजीर भी' और 'स्याही में सुरखाब के पंख' जैसे 6 कहानी संकलनों में आपने समाज के भीतर व्याप्त सच्चाई को शब्दों का उचित कैनवास दिया है। इन कहानियों के माध्यम से साहित्य जगत में एक विशेष स्थान बनाया है। समाज की जिन कुरूपताओं को कहा नहीं जा सकता, उसे उनकी कहानियों के किरदारों ने बखूबी कहा है। "हंस" पत्रिका में आपकी पहली कहानी "ऐ अहिल्या" छपी। वैसे वे स्वयं बताती हैं कि जब उन्हें कुछ समझ आई थी, संभवतः 11 वर्ष की आयु में अन्याय के विरोध में एक कविता लिखी थी जिसके शब्दों में सबकी आवाज प्रतिध्वनित हुई थी।लेखक की आवाज सबकी आवाज बने तभी वह सार्थक है। आपकी बहुत- सी कविताओं को मदनमोहन ने" नई रचना" पत्रिका में प्रकाशित कीं जिससे उत्साह वर्धन मिला। वे मानती हैं लेखक बनना बहुत ही जिम्मेदारी का कार्य है। यह बात उन्हें तब समझ में आई थी जब 2001 में कथादेश के अंक में "मुक्ति प्रसंग" कहानी छपी और वे खुशी के मारे उड़ने लगी थीं । उस समय ढेर सारे पत्र आए थे जिनमें प्रशंसा से लेकर मिलेजुले विचारों की प्रतिक्रिया वाले पत्र थे। ऋषिकेश में पढ़ाने के दौरान बस- यात्रा में साधारण लोगों की समस्याओं और उनके अनुभवों, मानसिकता आदि से गुजरने का अवसर मिला। उन्हीं अनुभवों के फलस्वरूप इस कहानी को इतनी प्रशंसा मिली। लेकिन जिनसे प्रेरणा और अनुभवों को प्राप्त करके लिखी वे लोग संतुष्ट नहीं हुए क्योंकि सबकी बातें और उनकी समस्याएं तो छूट ही गईं थीं, उस एक कहानी में सबकी बात आनी संभव नहीं थी। कहाँ तो वे आकाश में उड़ रही थीं और उनकी अनगिनत समस्याओं ने उनकी उड़ान पर मानो रोक लगा दी और धड़ाम से वे धरातल पर आ खड़ी हुईं। लेखन उड़ने के लिए नहीं है। हम तो खूब छ्प रहे हैं और पुरस्कार मिल रहे हैं, मैं हीरो बन गई या खुशियां मिल गईं। नहीं, उनका मानना है कि लेखन जिम्मेदारी और गंभीरता का विषय है।अपनी जमीन न छोड़ने वाली अल्पना मिश्र ने उपन्यास का सहारा लिया जहाँ वे बहुत से लोगों की बात को कह सकती हैं। छपने और प्रकाशित होने के बाद भी वे वहीं रहती हैं। दुष्यंत कुमार की पंक्ति का हवाला देते हुए उनका कहना है - "मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग, चुप कैसे रहूँ।" अपनी बैचेनी को सबसे जोड़ना ही सबकी आवाज है। उपन्यास 'अन्हियारे तलछट में चमका ' के प्रथम पृष्ठ के कुछ अंश पढ़ने से ही उत्सुकता जगती है - - "मैं अपने-आप से लड़ रही थी। यह आसान नहीं था। आदमी लहूलुहान हो जाता था और बाहर से दिखता भी नहीं था। दुनिया चोट के निशान को प्रत्यक्ष प्रमाण मांगती थी। प्रमाण नहीं होने पर सिरे से खारिज कर दिया जाता था। इसके बावजूद भीतर की लड़ाई जारी रहती थी। बड़ा भीषण था युद्ध का भीतर होना, बड़ा भीषण था कि शत्रु अपने ही भीतर छिपा बैठा था। अपने ही भीतर कायरता का अगाध समुद्र लहरा रहा था। रोकता, डराता, विचलित करता जहाँ सबसे ज्यादा गहरा था, वहीं से उतरा कर निकलना था। * * * अलग दिखना और अलग होने में फर्क होता है। जीवन बहता रहता था। बहते हुए को साफ दिख जाता था, कुछ बहकर आगे निकल जाता था। हमारी पकड़ से बाहर, हमारी नींद से भी बाहर, हमारे स्वप्न से भी बाहर, हमारी पहचान से भी बाहर रहता था।इसी फर्क में जीवन बहता रहता था। " यह उपन्यास बनारस की पृष्ठभूमि पर लिखा हुआ है। " अस्थि फूल" सामाजिक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में आंदोलनों की साझेदारी है जो झारखंड - हरियाणा से होता हुआ दिल्ली तक फैला हुआ है। जहां स्त्री और पृथ्वी उपस्थित है। तीन आलोचना की पुस्तकें" स्त्री कथा के पांच स्वर", "सहस्त्रों विखंडित आईने में आदमकद" , "स्वतंत्रोतर कविता "ने लेखन जगत में खूब धाक जमाई। मध्यवर्गीय स्त्रियों के साथ साथ निम्न वर्ग की स्त्रियां भी इनके लेखन का विषय रहीं। "भीतर का वक्त" कहानी में आज की स्त्री के मन में हो रहे परिवर्तन की ओर तथा अपनी लैंगिक वर्जनाओं की सीमा को लांघकर अपने व्यक्तित्व की खोज कर रही स्त्री की अन्तर्गाथा है। पंजाबी, बांग्ला, कन्नड़, अंग्रेजी, मलयालम, जापानी, रूसी भाषाओं में आपकी कहानियों का अनुवाद हुआ है। कुनूर विश्विद्यालय, केरल, केरल विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, अवध और फैजाबाद विश्वविद्यालयों में बीए तथा एम ए के पाठ्यक्रमों में आपकी कहानियां शामिल की गई हैं। शैलेश मटियानी स्मृति कथा सम्मान(2006) और परिवेश सम्मान, राष्ट्रीय रचनाकार सम्मान, शक्ति सम्मान, प्रेमचंद स्मृति कथा सम्मान, भारतीय भाषा परिषद कोलकाता (2008) सम्मान से सम्मानित की गई। उनका मानना है कि पुरस्कार लेखन के प्रति और जिम्मेदारी बनाते हैं। नवाचार के विषय में उनका कहना है कि निरी कल्पना नहीं, ट्रीटमेंट नया होना आवश्यक है। नये यथार्थ को लाने के साथ-साथ नई दृष्टि लाने की आवश्यकता है। सच्चाई की मूल समस्याओं पर जाना चाहिए।हर क्षेत्र में स्पेस देने की आवश्यकता है। कोई भी साहित्य तभी नया होता है जब समाज में संवाद हो, बहस हो, तर्क हो तभी नई नई शाखाएं बनती हैं। परिवेश के साथ वैयक्तिक अनुभव, अध्ययन और परिश्रम से प्रतिभा का विकास होता है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदीजी का कहना है कि" प्रतिभा किसी के कुल की विरासत नहीं है।" अल्पना मिश्र किसी भी बड़े साहित्यकार की रचना को उनके मापदंडों के अनुसार ही आंकती हैं न कि किसी और से समानता के आधार पर। 2018 नवंबर में जापान सरकार ने किसी हिंदी रचनाकार पर फोकस कर 15 दिनों तक कार्य किया जो हिंदी जगत के लिए गौरव की बात है। जहां जापान की प्रसिद्ध कवि योको तवाडा़ और अस्सी की दशक की मशहूर कथाकार हिरोमी इटो जी से आपका अविस्मरणीय संवाद हुआ। उस यात्रा का संस्मरण भी आपने लिखा है। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी की ऐसोसिएट प्रोफेसर हैं। अभी भी उनका काम जारी है - 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