Saturday, March 4, 2023
चिंतन मोती
चिंतन - मोती
द्वारका प्रसाद गर्ग
हर सुबह एक प्रेरक प्रसंग लिख लें तो दिन अच्छा बीतता है। कहते हैं न कि कोई बात मन में पैठ जाय तो मनुष्य का इतिहास बदल जाता है। प्रेरक प्रसंग हमारी बुद्धि और विचारों को प्रेरित करती है। यह आपकी रुचि पर निर्भर है कि आपको अपने जीवन में क्या पसंद है उनसे संबंधित अनुभवों को अपनी डायरी में लिख लेते हैं। हमारे संस्कार ही मनुष्य की सबसे बड़ी वसीयत है और वही हमारे अंदर की मनुष्यता को बचाए रखती है।" सर्वे भवन्तु सुखिनः" की भावना रखने वाले द्वारका प्रसाद गर्ग ने भारतीय संस्कृति, आचार - विचार के प्रति अपनी श्रद्धा प्रदर्शित करते हुए इस डायरी में असंख्य विचार मोतियों को पिरोया है। आपके जीवन की गुणवत्ता को अपने चिंतन से पूर्णता प्रदान करने का प्रयास किया है।
डायरी लिखना अपनी रचनात्मक ऊर्जा को प्रकाशित करना है। डायरी को व्यक्तिगत ही समझा जाता रहा है लेकिन वह कई रूपों में प्रयुक्त होती है। सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक , राजनीतिक, इतिहास, साहित्य आदि सभी विषयों में डायरी ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
वर्तमान समय में नैतिक मूल्यों और आदर्शों में आए बदलाव ने कहीं- न - कहीं भारतीय संस्कृति को आहत किया है। बुद्ध, महावीर, राम, कृष्ण, कबीर, नानक, मीरा की इस धरती को बचाने के लिए संभवतः पुनः अपनी जड़ों से जुड़ना होगा।
द्वारका प्रसाद गर्ग ने आठ दशकों से अधिक अपनी जीवन यात्रा में सदैव गतिशीलता और सकारात्मक ऊर्जा को महत्व दिया। यही कारण है कि उनकी डायरी में लिखे " चिंतन- मोती "किसी भी व्यक्ति के चिंतन को आशा और उत्साह से भरने में सक्षम हैं ।ईशोपनिषद् का यह श्लोक किसी धर्म या किसी विशेष विचारधारा का प्रतीक नहीं है बल्कि मनुष्य जीवन की सच्चाई है - - -
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्, पूर्ण मुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।
ऐसे ही जहांँ से उपदेश और अच्छे दोहे मिले, वे लेखक की डायरी के अंग बनते गए। राम के आदर्शों को सर्वोपरि मानते हुए द्वारका प्रसाद गर्ग ने राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त के खंड काव्य 'साकेत' की ये पंक्तियाँ राम के मुख से सुनना पसंद किया है - - -
संदेश यहाँ मैं नहीं, स्वर्ग का लाया।
इस भू-तल को ही, स्वर्ग बनाने आया।।
जीवन की संघर्षमय यात्रा को समतल और सामान्य बनाने में मनीषियों, महापुरुषों, साहित्यकारों, दार्शनिकों और अध्यात्मिक संतों के कहे गए अनुभवों ने हमारे जीवन को सहज - सुंदर - सरल बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
कबीर कहते हैं - मैं कहता आंँखिन की देखी।हमारे संतों ने जीवन को अनुभवों के आधार पर परखने की दृष्टि दी। ईश्वर के दिए शरीर और मन को स्वस्थ रखने के लिए पंचेंन्द्रियों का संयम और नियंत्रण भारतीय संस्कृति के महत्वपूर्ण अंग रहे हैं ।
उपनिषद, पुराण, गीता, महाभारत ग्रंथ और साहित्य, संस्कृति , भक्ति, ज्ञान और कर्म की महत्ता आदि की महत्वपूर्ण उक्तियों को लिखना और संरक्षित करना पीढ़ी - दर- पीढ़ी को हस्तांतरित करना, भारत को बचाने का ही उद्देश्य है।
उपदेशात्मक, आध्यात्मिक, शास्त्रों का ज्ञान हमारे जीवन को स्वस्थ और अनुशासित तो करते ही हैं, साथ ही परिवार, समाज, देश और राष्ट्र के चरित्र और आदर्शों की उन्नति के लिए सहायक कड़ी के रूप में कार्य करते हैं।
लेखक का मानना है कि प्रशंसा के पात्र तो केवल वही हैं जिन्होंने स्व-पुरुषार्थ के बल पर राम- नाम रूपी धन संग्रह किया है। कहा गया है कि अधर्म पर आश्रित रहकर करोड़ों - अरबों रुपयों की धन - संपत्ति अर्जित भी कर ली, तो भला कौन - सा तीर मार लिया - 'सुत दारा अरु लक्ष्मी पापी के भी होय?'
डायरी विधा में लिखे गए विचार अपनेपन को लिए व्यक्तिगत और बहुत ही निजी होते हैं। लेखक ने अपने लिखने के सद्प्रयास को जारी रखा जो व्यष्टिगत होते हुए भी समष्टिगत हैं । संस्कृत सुभाषित, स्कंदपुराण,पद्मपुराण, विष्णु पुराण,भोज - प्रबंध, सद्गुरु भक्ति- रहस्य, संत- वाणी, चाणक्य श्लोक, गीता, महाभारत, ईशोपनिषद्, गंगा स्तोत्र, श्रीमद्भागवत, रामधारी सिंह दिनकर की रचना आदि बहुविध भारतीय वाङ्मय में जहाँ भी सुभाषित और बहुमूल्य वचन मिले, लेखक ने सहर्ष ही डायरीबद्ध किया ।
अवचेतन मन में डायरी में लिखा शब्द मन- मस्तिष्क में अंकित हो जाता है।संस्कृत, अवधी, हिंदी, अरबी-फ़ारसी राजस्थानी, सधुक्कड़ी, पंजाब, उर्दू, अंग्रेजी आदि सभी भाषाओं के सुभाषित वचन उनकी डायरी के अंग बने ।कोई भी भाषा, कहीं पर भी, कोई अवरोध उत्पन्न नहीं करती है वरन् हमारे लिए एक सांस्कृतिक सेतु की तरह काम करती है। संगीत तो वही भाता है, जो शरीर के पोर - पोर को आनंदित कर दे। भारत विविध भाषाओं का देश है लेकिन उसकी आत्मा वेदों और संस्कृत की गंगोत्री से ही निकल कर संपूर्ण देश की रगों में बहती है। गंगा नदी सभी नदियों में सर्वश्रेष्ठ नदी मानी गई है। कहा भी गया है - 'तीर्थानां परम तीर्थं नदीनां परमा नदी' पौराणिक काल से ही जाह्नवी भागीरथी माँ गंगा का गुणगान चलता आ रहा है, तो भला हमारे संस्कार हमारी आत्मा में क्यों नहीं रचे-बसेगें?
'संसार है एक नदियाँ, सुख दुःख दो किनारे हैं - फिल्म का गीत जीवन के वास्तविक दर्शन और भावों को बहुत ही सरल भाषा में व्यक्त करता है जो भारतीय भाषा और संस्कृति का संगीत है। जनसाधारण से लेकर प्रबुद्ध, सभी डायरी लेखन के साथ बहुत ही निकटता और आत्मीयता के भाव को महसूस करते हैं।
लेखक उदार, सकारात्मक ऊर्जा और आस्तिक दृष्टिकोण से अनुप्रेरित है, वह ईश्वर प्रदत्त शरीर की रचना को सर्वश्रेष्ठ समझता है। उसके लिए भारतीय आचार- विचार और व्यवहार को अमल करने के लिए कृतसंकल्प है ---डायरी की ये पंक्तियाँ इसी बात की द्योतक हैं--
'ईश्वर का दिया, कभी अल्प नहीं होता।
जो टूट जाय बीच में, वह संकल्प नहीं होता।'
इस साधु कार्य को करवाने का श्रेय श्री आर. के. पंसारी को जाता है, जिन्होंने द्वारका प्रसाद गर्ग की व्यक्तिगत डायरी को सार्वजनिक करने के लिए प्रकाशित करने का महत्वपूर्ण कदम उठाया जो 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' के उद्देश्य को चरितार्थ करने वाला है ।'
चिंतन - मोती' की ये बहुमूल्य लड़ियांँ किसी- न- किसी व्यक्ति को अवश्य ही उद्वेलित करेंगी, ऐसी आशा और उम्मीद रखती हूँ।
बधाई और शुभकामनाएँ ।
दिनांक
जुलाई , 2021
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