Saturday, March 4, 2023
जीवन प्रभात के मोती :भूमिका
जीवन प्रभात के मोती
संसार के विषवृक्ष पर दो अमृतोपम फल लगे हैं, वे हैं काव्य और सत्संग। काव्य सभी युगों में सामयिक होते हैं। उनका संदेश हर स्थिति में उपयोगी सिद्ध हुआ है। हमारे देश का महाकाव्य हमारे देशवासियों को हमेशा ही शिक्षा देते रहे हैं।
जब कभी हम दुःख या कष्ट में होते हैं, हम उन्हीं की शरण में जाते हैं और वे हमें आध्यात्मिक सुख प्रदान करते हैं। चाहे रामायण हो, महाभारत हो - सभी हमारे सामने इस प्रकार के उदाहरण प्रस्तुत करते हैं कि मनुष्य को जीवन के कठिन क्षणों में किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए।
सभी में मानव मन को झकझोर देने, हृदय को सहलाने, मानव की संपूर्ण प्रकृति को समृद्ध बनाने और मानव को नया स्वरूप प्रदान करने की शक्ति मौजूद है। यही काव्य का उद्देश्य भी है।
सत्संग से भी बहुत लाभ होता है, लेकिन आज के युग में सज्जनों को ढूंँढना बहुत मुश्किल है। हम छोटी मोटी बातों में बुरी तरह उलझे हुए हैं जबकि हम हर तरह से संपन्न हैं चाहे जनशक्ति हो, प्राकृतिक साधन हों। हम जात - पांत, धर्म आदि के छोटे - मोटे झगड़ों में फँसे हुए हैं।
संस्कृत भाषा भारतीय जीवन की संस्कृति और आदर्श रहे हैं। वेद, उपनिषद, गीता, पुराण आदि वाङ्गमय और उससे संबंधित साहित्य में जो संदेश दिया गया है, वह भारत ही नहीं, किसी भी देश के व्यक्तित्व को निखारने - सँवारने के साथ- साथ प्रेरणादायी हैं। कहा जा सकता है कि प्रशंसा के पात्र तो केवल वही हैं जिन्होंने पुरुषार्थ के बल पर राम नाम रूपी धन संग्रहित किया है। कहा गया है कि अधर्म पर आश्रित रहकर करोड़ों अरबों रुपयों की धन संपत्ति अर्जित भी कर ली, तो भला कौन सा तीर मार लिया - 'सुत दारा अरु लक्ष्मी पापी के भी होय?'
दुर्योधन एवं श्रीकृष्ण के मध्य संवाद जहाँ वह धर्म के बारे में जानना चाहता है।
माता पिता का आदर, सर्वश्रेष्ठ माँ गंगा नदी का महत्व, भारत भूमि में जन्म लेना देवताओं की अपेक्षा अधिक धन्य और भाग्यशाली होना आदि कई क्षेत्रों में सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक मूल्यों के क्षेत्र हैं जो मनुष्य जीवन को बहुमूल्य बनाने में अपना योगदान देते हैं।
नये समाज की नई रचना अतीत की सीढ़ियों से ही चलकर आती है। हमें एक ऐसी दृष्टि प्राप्त करने की आवश्यकता है जो हमें पूर्वाग्रहों और पूर्वधारणाओं से मुक्त हो। एक ऐसा स्वरूप प्राप्त करना है जो स्थितप्रज्ञ हो।भगवद्गीता में कहा गया है -
दुःखेशु अनुद्विग्नमनः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतराग भय क्रोधः स्थितधीर्मनिरुच्यते।।
यः सर्वत्र$नभिस्नेहःतद्तप्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में मुक्त होता है। न तो दुःख में उसका मन उद्विग्न होता है, न ही सुख में उल्लसित होता है। वह दोनों स्थितियों में समान रहता है। वह भले और बुरे सभी लोगों के प्रति मैत्री भाव रखता है। वह द्वेष आदि से दूर होता है। ऐसा व्यक्ति स्थितप्रज्ञ कहलाता है।
हमारे देश में एक लंबी परंपरा रही है जो बताती है कि सच्चे अर्थों में धार्मिक व्यक्ति की परीक्षा उसके सिद्धांतों या पूजापाठ से नहीं की जानी चाहिए, बल्कि यह देखकर की जानी चाहिए कि जीवन में उसका आचरण कैसा है। डॉ राधाकृष्णन मत संबंधी अनुकूलता या विधिपूर्वक भक्ति के नाम को धर्म कहते हैं। धर्म आत्मा का परमात्मा के साथ मिलन है
विदुर नीति, चाणक्य नीति आदि में मेधा की महिमा और बल समझाया है। नीतिकारों ने भी पांच प्रकार के बल बताएंँ हैं- बाहु बल, अमात्य बल, धन बल, अभिजात बल और प्रज्ञा बल। इन सभी में प्रज्ञा बल या बुद्धि बल को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। 'यद् बलानां बलं श्रेष्ठं तत् प्रज्ञाबलमुच्यते' विदुर नीति की पंक्ति यही कहती है कि राष्ट्र तभी आगे बढ़ता है जब ज्ञान, शक्ति, धन और सेवा बल संतुलित होकर काम करें। चाणक्य ने भी बुद्धि के बल पर ही राजाओं की चतुरंगिणी सेना पर विजय प्राप्त की।
हरिवंश पुराण में कहा गया है' मननान्मुनिरेवासि' अर्थात मनन से ही मुनि बनता है। मनुष्य की जीवन- यात्रा अच्छाई पर निर्भर करती है।
यदि कोई प्रेरक वाणी का उद्घोष करने वाला मिले तो हम सभी विपत्तियों के सागर को लांघ कर सफलता के उच्च शिखर पर पहुंँच सकते हैं ।
-डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता
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