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Saturday, March 4, 2023

मुक्ता मणि माला से

पृष्ठ 2 --- 1- गायन्ति देवाः किल गीतकानीधन्यास्तु ते भारत भूमि भागे। स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात् ।।(विष्णु पुराण) 2- दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभंगुरः । तत्रापि दुर्लभं मन्ये नमस्ते वैकुण्ठप्रियदर्शनम्।।(श्रीमद्भागवत, 11/21/29) 3- ईश्वर नाम अनमोल, बिन दाम ही बिकाय। तुलसी अचरज देखिये, कोई ना ग्राहक आय।। 4- कबिरा सोकर क्या करे, जगकर जपो मुरारी। एक दिन तू भी सोवेगा, लंबे पाँव पसारी ।। 5- तुलसी "रा " के कहत ही निकसत पाप पहार। पुनि आवन पावत्त नहीं, देत मकार किवार।। 6- देह धरे कर यह फल भाई। भजिअ राम सब काम बिहाई।। (तुलसीदास) ऐ गुल जरा सब्र तो रख, ज़मी भी होगी मुकाम भी होगा। 8- तुलसी तनिक न छोड़िये, लेन हरि को नाम। मानुष मजुरी देत है, क्यों रखेंगे राम।। 9- ईश्वर का दिया, कभी अल्प नहीं होता। जो टूट जाय बीच में, वह संकल्प नहीं होता।। पृष्ठ 3-- 1- यत्र सर्वेपि नेतारः सर्वे पंडितमानिनः। सर्वे महत्वमिच्छंति तत्र कार्यं विनिश्यति ।। 2-प्रभु प्रभु लय लागी नहीं, पड़्यो न सद्गुरु पाय। दीठा नहिं निज दोष तो, तरिये कौण उपाय।। 3- यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा, शास्त्रं तस्य करोति किम् । लोचनाभ्यां विहीनस्य, दर्पणः किम् करिष्यति।। 4-ऋण कर्ता पिता शत्रुर्माता च व्याधिचारिणी। भार्या रूपवती शत्रु पुत्र शत्रु पंडित् 5- अर्थ नाशं मनःस्तापं गृहणी चरितानि च। नीच वाक्यं च अपमानं मति मान्न न प्रकाशयेत।। 6- नैवं पश्यति जन्मांध कामान्धेन पश्यति । न पश्यति मदोन्मत्तो त्यर्थी दोष न पश्यति।। 7- सत्यं इदं क्षमी दाता गुणग्राही स्वामी दुःखेन लभ्यते। अनुकूलः शुचिर्दक्षो राजन् भृत्योपि दुर्लभः।। (भोज प्रबंध) 8- सुख के माथे सिल पड़े, हरि हृदय से जाए। बलिहारी वा दुःख की, जो पल - पल नाम गिनाय ।। पृष्ठ 4 - - - 1- पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि, जल मंत्रम् सुभाषितम्। मूढ़ैः पाषाणखण्डेषु, रत्नसंज्ञा प्रदियते।। 2- नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः। नास्ति मातृ समं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया ।। 3- यं माता - पितरौ क्लेशं सहते लभते नृणाम् । न तस्य निष्कृतिःशक्या कर्तुं वर्षशतैरपि।। अर्थ - मनुष्यों के जन्म तथा पालन - पोषण में माता - पिता जिस कष्ट को सहन करते हैं, उसका ऋण सौ वर्ष में भी नहीं चुकाया जा सकता। 4- क्रोधः प्राणहरः शत्रुः क्रोधो मित्रमुखो रिपुः। क्रोधोह्यसिर्महातीक्ष्णःसर्व क्रोधो $पकर्वति ।। अर्थ — क्रोध तो प्राणों को नष्ट करने वाला शत्रु है। क्रोध मित्र - सा दिखाई देनेवाला दुश्मन है। क्रोध तीव्र तीक्ष्ण तलवार के समान है। क्रोध सभी की अवनति करने वाला है।

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