Powered By Blogger

Saturday, March 4, 2023

मुक्ता मणि माला से

द्वारका प्रसाद गर्ग 32 पृष्ठ 32 1- शान्ति तुल्यं तपो नास्ति संतोषात्परं सुखम् । न तृष्णायाः परोव्याधिर्नं च धर्मो दयापरः।। (चाणक्य नीति) अर्थ - शांति के समान तप नहीं, संतोष के पृष्ठ 35- 1- प्रह्लाद की निर्भीकता - मोको पहिरावो पाँव बेड़ी ने बँधाओ गाढ़े बंधन बंधाओ वो, खिंचावों काची खाल तें बिछूले बिछाओ तापे मोहि लो सुलाओ फिर आग भी लगाओ बाँध कापड़ दुशाले तें गिरी तें गिराओ काले नाग से डसाओ मझधार में डुबोओ बांध पाथर कमाल से विष भी पिलाओ मोहि अग्नि में जराओ पर नेह न छुडा़ओ गिरधारी गोपाल तें। 2- नृसिंह भगवान की कृपा - गिरीते गिराये पुनि, जल में डुबोये हाय अग्नि में जलाये राखि, कभी न सताने में मंजुल मुखारविन्द चूम - चूम कहे प्रभू क्षमा करो पुत्र मोहे देर भई आने में। 3- क्वेदं वपुः क्व च वयः सुकुमारमेतत्, क्वेतः प्रमत्तकृतदारुणयात् नाश्च । श्रुत्वा तवदार्तवचनं झटिति प्रातः, क्षन्तव्यमङ्ग! यदि में समये विलम्बः।। पृष्ठ 36- 1-सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः । संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्। (महाभारत, स्त्री पर्व) 2- सर्वथा सुकरं मित्रं दुष्करं प्रतिपालनम् । (वाल्मीकि रामायण 2.105.16) अर्थ - मित्रता करना सहज है लेकिन उसको निभाना कठिन है। अनित्य त्वात् तु चितानां प्रीतिरल्पे$पि मिद्यते।। 3- ### 4- शोको नाशयते धैर्यं शोको नाशयते श्रुतम्। शोको नाशयते सर्वं नास्ति शोकसमो रिपुः।। (वाल्मीकि रामायण 2.62.15) 5- सुलभा पुरुषा राजन सततं प्रियवदिनः। अप्रियस्य च पथ्यसय वक्तॉ श्रोता च दुर्लभः।। (वाल्मीकि रामायण, अरण्यकाण्ड) 6- सुखावसाने इद्मेव सांरं दुःखावसाने इदमेव ज्ञेयम्। देहावसाने इदमेव जाप्यं, गोविंद दामोदर माधवेति।। अर्थ - जीवन में सुख का समय जब अवसान की तरफ़ हो तो यही सार है। जीवन में दुख का समय जब जाने वाला हो तब यही एक मंत्र जानने योग्य है। पृष्ठ 37 प्रश्न 1-- जल से पतला कौन है? कौन भूमि से भारी? कौन अग्नि से तेज है? कौन काजल से कारी? उत्तर - जल से पतला ज्ञान है। पाप भूमि से भारी। क्रोध अनल से तेज है कलंक काजल से कारी। प्रश्न 2- सबसे विश्वसनीय मित्र कौन है? सर्वश्रेष्ठ प्रकाश कौन-सा है? दूध किसका अच्छा है? सबसे अच्छा कौन है? उत्तर - भाई सरीखो भट नहीं। तेज न सूर्य समान। दूध गाय के सम नहीं है। भूप न भोज समान। दूसरा उत्तर - भुजा सरीखो भट नहीं, तेज न नेत्र समान । दूध मात के सम नहीं, भूप न इन्द्र समान। पृष्ठ 38 1- भूखे को अन्नदान और जलदान, रोगियों के हेतु औषधालय खुलवाते हैं। किंतु दोनों में से श्रेष्ठ ज्ञान दान हेतु अधिकारी विद्वानों को बुलाते हैं। ऐसे उदार दान - दाताओं को धन्य-धन्य उनकी क्या गति होती सुनो! वे बताते हैं और सब लोग भगवान की खोज करते, किंतु दानी की खोज स्वयं भगवान करते हैं। 2- सानन्द सदनं सुताश्च सुधियः कान्ता मनोहारिणी सन्मित्रं सधनं स्वयोषिति रतिः चाज्ञापराः सेविकाः। आतिथ्यं सुरपूजनं प्रतिदिनं मिष्टान्नपानं गृहे साधोः संङ्ग मुपासमते हि सततं धन्यो गृहस्थाश्रमः।। (गृहस्थाश्रम) अर्थ - आनंद हो ,पुत्र विद्वान हो , संतान, सुंदरी पत्नी प्रिय बोलने वाली हो , सच्चे मित्र, सात्विक धन, स्वपत्नी में प्रीति, सेवा परायण सेवक, प्रतिदिन अतिथि - सत्कार, देव- पूजन एवं भोजन में मिष्ठान्न का प्रबंध तथा जिस घर में साधुओं का संग मिलता रहता है और उपासना होती रहती है, वह गृहस्थाश्रम धन्य होता है। पृष्ठ 39 1- प्रीणति यः सुचरितैः पितरं स पुत्रो, यद् भर्तुरेव हितमिच्छति तत्कलत्रम्। तन्मित्रमापादि सुखे च समक्रियं, यद्एतत्त्रयं जगति पुण्यकृतो लभन्ते। अर्थ - जो अपने पिता को अपने सदाचरण से प्रसन्न कर देता है वही वस्तुतः पुत्र है। जो पति के हित की कामना करती है वस्तुतः पत्नी है। सच्चा मित्र वही है जो संकट और सुख के समय समान रूप से साथ निभाता है। इस प्रकार ये तीनों श्रेष्ठ व्यक्तियों को पुण्यशाली लोग ही प्राप्त कर सकते हैं। 2- पुनर्वो असुं पृथिवी ददातुः पुनद्रयौ दैवी पुनरिन्त रक्षम्। पुनर्नः सोमस्तन्वं ददातु पुनः पूषां पथ्यांयास्वस्ति।। (ऋग्वेद अ. 8.अ 1 1ब 23.मंत्र 677) अर्थ - दिव्य गुणों वाली यह पृथ्वी हमें फिर प्राणशक्ति दे, द्यो लोक भी हमें प्राण शक्ति दे, अन्तरिक्ष भी हमें प्राणशक्ति दे , परमेश्वर हमें उत्तम शरीर दे, पोषक वायु हमें पुष्टि दे और जो प्रभु की वाक् शक्ति हमें कल्याणकारी वाणी प्रदान करे। 3- #### सत्यं वद, धर्मं चर स्वाध्यायान्मा प्रमदः। आचारस्य प्रियं धन माहृत्य प्रजातंतुं मा व्यवच्छेत्सीः।।(शिक्षावल्ली, तैत्तिरीय उपनिषद् पृष्ठ 40- 1- तुलसी या संसार में सबसे मिलिए धाय। क्या जाने किस वेष में नारायण मिल जाय।। 2- क्षणभंगुर जीवन की कलिका प्रातः खिली न खिली, मलयाचल की शुचि शीतलमंद सुगंध समीर चली न चली, भजले हरि नाम अरे रसना, फिर अन्त समय में जाने हिली न हिली। 3- नाचना जो चाहो, तो नाच रघुनाथ आगे । गाना जो चाहो, तो गोविंद गुण गाओ जी। भागना जो चाहो, तो भाग मंद कामों से। आना जो चाहो तो राम शरण आओ जी। 4- बड़े न हूजे गुन न बीन, बिरद बड़ाई पाय। कहत धतूरे को कनक, गहनों गढ़ो न जाय।। 5- धन- यौवन उड़ जाएगा, जेहि विधि उड़त कपूर। मन- मूरख गोविंद भज, क्यों चाहत जगधूर।। 6- कर्कोटकस्य नागस्य दमयन्त्या नलस्य च। ऋतुपर्णस्य राजर्षेः कीर्तनं कलिनाशनम्।। (महाभारत पुराण) पृष्ठ 41- 1- तन पवित्र सेवा किए, धन पवित्र कर दान। मन पवित्र हरिभजन कर, त्रिविध होत कल्याण। 2- माया तजी तो क्या भया, मान तजा नहीं जाय। जेहिं मानैं मुनिवर ठगे, मान सबन को खाय।। 3- मैं मैं बड़ी बलाय, सको तो निकलो भाग। कह कबीर कहँ लग रहे, रुई लपटी आग।। 4- सुशीलो मातृपुण्येन पितृ पुण्येन चातुरः । औदार्य वंश पुण्येन आत्मा पुण्येन भाग्यवान।। 5-स्वैरत्वै संग दोषेण दार दोषे दरिद्रता।। सुशीलो मातृ पुण्येन पितृपुण्येन पंडिताः। औदार्यं वंश पुण्येन आत्म पुण्याद् धनार्जनः।। 6- आचारः परमो धर्मः सर्वेषामिति निश्चयः । हीनाचारपरितात्मा प्रेत्य चेह विनश्यति ।। 7- नैनं तपांसि न ब्रह्म नाग्निहोत्रं न दक्षिणाः।q111q हीनाचार मितो भ्रष्टं तारयन्ति कथञ्च ।। 8- सर्व लक्षण हीनो$पि यः सदाचारवान्नरः। श्रद्दधानो$नसूयश्च शतं बर्षाणि जीवति ।। पृष्ठ 42 1- भीष्म को कृष्ण का आश्वासन - भाखत कहा हौं, ऐसी धारणा न राखो चित्त, प्रण के विरुद्ध पक्षपात ना बिचारिहौं, सारथी बनों हों रथ हांँकिबे मेरो काम, न्याय बद्ध युद्ध के नियम न बिगारिहौं। ' बिन्दु' कवि होयना प्रतीति जो तुम्हें तो सुनों साँची सौं करिके समस्त शंक टारिहौं जो पै होय हौं सबल सपूत एक बाप ही को तो पै काहूँ भांँति शस्त्र करि में धारिहौं पुनः भीष्म की शंका का निवारण - - - - 2- बोले घनश्याम सुनों भीषम भगत राज मेरे जन्म देने वाले जग में अपार हैं। खम्भ, सिन्धु, पृथ्वी, पावक से प्रकट हौंहूँ, कहाँ लौ बखानों ये अमित अवतार हैं, 'बिन्दु' कवि कहे कोई देवकी को लाल कहे, कोई कहे नंद के यशोदा को कुमार है। होय एक बाप तो बचावें निज लाज को, मेरी कौन लाज मेरे बाप तो हजार हैं। 3- प्रायेण देव मुनियों स्वमुक्ति कामाः मौन्नं चींरती विजने न परार्थ निष्ठा नैताणविहाय कृपणान् मुमुक्ष एको, नान्यं त्वदेव शरणम् भ्रमताने पश्च्य । पृष्ठ 43- श्री 1- प्रभु ने दो दो कर दिए हैं, करो कमाई आप। पराधीनता सम नहीं, और दूसरा पाप।। 2- जो पराये काम आता धन्य है जग में वही। द्रव्य ही जोड़कर कोई सुयश पाता नहीं।। 3- पास जिनके रत्न शशि, अनन्त और अशेष हैं । क्या वह सुरधुनि कै, सम हुआ लेश है।। 4- संदेश यहाँ मैं नहीं स्वर्ग का लाया। इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया।। (मैथिली शरण गुप्त, साकेत) 5- जिन्दगी में किसी का साथ ही काफी है, कन्धे पर रखा हुआ हाथ ही काफी है, दूर हो पास क्या फर्क पड़ता है, क्योंकि अनमोल रिश्तों का अहसास ही काफी है। 6- ## कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा काल कारणम् इति ते संशयो मा भूद् राजा कालस्य कारणम्। 7- सर्वतीर्थ मयी माता सर्वदेवमयः पिता। मातरं पितरं तस्मात् सर्वयत्नेन पूज्येत्।। (पद्मपुराण, सृष्टि खंड 47/11) 8- विद्वत्वं च नृपत्वं च नैव तुल्ये कदाचन। स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान सर्वत्र पूज्यते। 9- शुभस्य शीघ्रम् अशुभस्य काल हरणम्। पृष्ठ 44- 1- रहिमन निज मन व्यथा, मन ही राखो गोय। सुनि हठिलें हैं लोग सब, बाँट न लहिए कोय।। 2- कबिरा जो मन निरमला, जैसा गंगा नीर। पाछे पाछे हरि फिरे, कहत कबीर कबीर।। 3- भरम परा तिहुँ लोक में, भरम बसा सब ठांँव। कहे कबीर पुकार के बसे भरम के गाँव।। 4- जो रहीम ओछे बढ़े, तो बहुत उत्पात। प्यादे से फरजी भयो, टेडो़ टेड़ो जात।। 5- नर सम्पत्ति बिन पाय के, अति मत करियो कोय। दुर्योधन अति भावतें, भयो निर्धन कुल खोय।। 6- कबिरा गरब न कीजिये, कबहूँ न हंँसिये कोय। अबहूँ नाँव समुद्र में, क्या - क्या जाने क्या होय।। 7- तुलसी जाके बदन से, धोकेहुँ निकसत राम। ताके पग की पगतरी, मेरे तन की चाम।। पृष्ठ 45- 1- जिसने देखा कभी नयन भर, मोहन रूप बिना बाधा। वही जान सकता है क्योंकर, कुल कलंकिनि है राधा।। 2- माया तजि तो क्या भया, मान तजा नहीं जाय। जेहिं मानैं मुनिवर ठगे, मान सबन को खाय।। 3- हम गंगोदक, हम गगन, हम दीपक, हम भानु। ये हीं तुम्हें डूबहैं, कुल कोरी अभिमान।। 4- सात दीप नवखण्ड में, तीन लोक जग माहिं। तुलसी शांति समान सुख, और दूसरो नाहिं।। 5- चार वेद षट् शास्त्र में, बात मिली है दोय। सुख दीने सुख होत है, दुःख दीने दुःख होय।। 6- कानन भूधर बारि बयारी, महाविषु व्याधि दवा अरि घेरे। संकट कोटि जहॉं तुलसी, सुत मातु पिता हितु बंधु न नेरे। राखिये राम कृपालु तहाँ, हनुमान से सेवक हैं जेहिं केरे। नाक रसातल भूतल में, रघुनायक एक सहायक मेरे। 7- कृष्ण त्वदीय पद पंकज पञ्जरान्ते अधैव में विशतु - मानस राजहंस प्राण प्रयाण समये, कफ़ वात पित्तै। कण्ठे वरोधन विद्यो, स्मरण कुतस्ते।। पृष्ठ 46 - राम - केवट संवाद - 1- जाने कैसे भाव के समाने हो कृपानिधान विमल विचारवान बुद्धि के सयाने हो मनि की मुदरी उपहार देत बारंबार कौन धर्मसार सरकार उर आने हो 'बिन्दु' कवि कहे जात गोत न त्यागो नाथ कहे जाँति-पाँति तोरबे की हठ ठानी है मैं तो हूँ केवट विधि सागर नदी को किन्तु आप भव सागर के केवट पुराने हो। 2- हाज़ीर हूज़री में भयो दास दीनानाथ नेक निज करुणा नजर से निहार दो देत उपहार कहाँ मुदरी मणि को मोहि देना है तो जन्म की कमाई एक बार दो रत्न, धन,धाम नाथ काम के न मेरे कछु हो प्रसन्न राम घनश्याम तो करार दो पार उतराई सरकार तब जानो जब पार भवसागर से मुझको उतार दो। 3- जो दस बीस पचास भये सत्, होय हजार तो लाख मँगेगी कोटि अरब्ब खरब्ब असंख्य पृथ्वी पति होने की चाह जगेगी स्वर्ग पताल को राज करौं, तृष्णा अघ की अति आग लगेगी 'सुन्दर 'एक संतोष बिनासठ, तेरी तो भूख कभी न मरेगी। पृष्ठ 47- 1- सत्यं शिवम् सुन्दरम् - ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्ण मुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्ण मेवावशिष्यते।। ॐ शांतिः ॐशांतिः ॐशांतिः। 2- सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भागभवेत्।। (शांतिपाठ) 3- ॐकार बिंदुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः। कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः।। 4- रे चित्त चिन्तय चिरं चरणों मुरारै पारं गमिष्यसि यतो भव सागरस्य पुत्र कलत्र मित्र नहीं ते सहाया सर्व विलोकय सखे मृग तृष्णा कामां। 5- व्रजे प्रसिद्धं नवनीतचौरं, गोपाङ्गनानां च दुकूलं चौरम्, अनेकजन्मार्जित पाप चौरं चौराग्रगण्यम् पुरुषं नमामि । 6- सुनहि शिष्य ये तीन उपाई, भक्ति योग हठ योग कराई पुनि सांख्य सुयोग ही मनलावै, तब तू शुद्ध स्वरूपहिं पावै। 7- ## शिवं विष्णुं गणेशं च शक्तिं सूर्यं च पूजनम् । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षर द्वयम्।। 36।।(दत्तात्रेय स्तवं) पृष्ठ 48- 1- यं ब्रह्म वेदान्त विदो वंदती परम प्रधानं पुरुषस्तथान्ये ।। विश्वोद्गते कारण मिश्र्वंरवा तस्मै नमो विघ्नविनाशनाय।। 2- यतो वेदयाचो विकुण्ठा मनोभिः सदा नेति नेतीति यत्ता गृणान्ति परब्रह्म रूपं चिदानंदभूतं सदा तं गणेशं नमामि भजामिः 3- स्वस्ति श्री गणनायकं गजमुखं मोरेश्वरम् सिद्धिदम् बल्लालं मुरूडं विनायक मढ़ चिन्तामणिं थेवरम् लोहाद्रिं गिरिजात्मजं सुवरदं विघ्नेश्वरं ओझरम् ग्रामे रांजण संस्थितो गणपतिः कुर्यात् सदा मंगलम्। 4- सिन्दूराभं त्रिनेत्रं पृथुत्तर जठरं हस्तपद्मैर्द धानं दंत पाशाङ्कुश्चेष्टान्युरूकर विलसद् बीज पूराभिरामम् बालेंदु द्योत मौलिं करिस्यति वदनं दानश्र्रार्द गण्डं भोगीन्द्राबद्ध भूषं भजत गणपतिं रक्त वस्त्राङ्गरागम् 5- नमस्तस्मै गणेशायं ब्रह्म विद्या प्रदायिनी। यस्यागस्यायते नाम विघ्न सागर शोषणे।। 6- ईश्वरे सानुकूले कः पीडितुं क्षमते जनम् । पृष्ठ 49 गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थ जम्बू फलचारु भक्षणम्। उमासुतम् शोक विनाशकारकम् नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम्। विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धितायं! नागाननाय श्रुतियज्ञविभूतिषाताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते।। - सुमुख श्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः । लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः। धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचंद्रो गजानन द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ।। विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निगमे तथा संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते।। पृष्ठ 50 - श्री गणेशजी की पूर्वजों द्वारा सुनी आरती - - ओम् जय गणपति स्वामी देवा जय जय जय शुण्ड जया जय चेतन शारद नामी - - ओम् जय गौरी पुत्र गणेश्वर परसन भव नामी - देवा ठुमक ठुमक पद त्रिभवन धारन गगने गुण गामी - ओम् जय एक दंत गज बदन विनायक मूषिका आरोही। - देवा मूषिका देवादि देव संतन वरदायक विघनन अघ हानी - ओम् जय भालचंद्र सिन्दूर बिराजे मुक्ता छवि मानी - देवा रिद्धि-सिद्धि नव के दायक गणपति अघ हानी - ओम् सुनि रानी सोई सुरत समानी मन वांछित दानी - देवा "अतित तुला पर "शरण बिहारी लम्बोदर नामी। - ओम् पृष्ठ 51 - 1- या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता या वींणा वरदण्ड मण्डित करा या श्वेत पद्मासना या ब्रह्माच्युत शंङ्कर प्रभृति भिर्दैवैः सदा वंदिता सामां पातु सरस्वती भगवती निःशेष जाड्या पहा। शुक्लां ब्रह्म विचार सार परमामाद्यां जगद् व्यापिनीं वीणा पुस्तक धारिणी मभयदां जाड्यान्धकारा पाहाम् हस्ते स्फाटिक मालिकां च मदधतीं पद्मासने संस्थिताम् वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धि प्रदां शारदाम्।। पृष्ठ 52- 1- हम ऐसी कुल बें किताबें क़ाबिल - ए-ज़ब्ती समझते हैं। कि जिनको पढ़के लड़के बाप को ख़ब्ती समझते हैं। (अक़बर इलाहाबादी) पृष्ठ 53- 1- अप जू सि नव तीस के बाकी के इकतीस फरवरी अट्ठाइस की चौथे संख्या उन्नतीस अर्थ - अप्रैल, जून, सितंबर, नवंबर चारों तीस दिन के माह होते हैं। शेष इकतीस दिन के, फरवरी 28 दिन का महिना और चौथे वर्ष 29 दिन का होता है। 2- कुम्भकर्ण - रावण संवाद - तुम चिंतित आज दशानन क्यों? हरली हमने मिथिलेश दुलारी । उपभोग किया तुमने उनका लखती न कभी वह ओर हमारी तुम राघव ही न फिर क्यों? इसमें हमको भय लागा भारी जब राघव रूप धरा मैंने जब मात समान लगी पर नारी। लक्ष्मी - पार्वती संवाद - - बाला जी बोली भिखारी, कहाँ अबला सुनिए बलिराज द्रगे पन्नग हैं कहाँ सुन्दरी भूषण ओ क्षीर समुद्र में सेज सवारे विष के पीवन हार कहाँ ओ पूतना के लिए कुच जाहिं निहारे, गोरा कहाँ व जोगी जटी धरि दण्डक में ताहि निहारें ऐ बात बताओ सखी कहाँ शंकर नाथ हैं प्राण पियारे।। पृष्ठ 54 - 1- पत्थर के जिगर वालों गम में वही रवानी है खुद ही राह बना लेगा, बहता हुआ पानी है। 2- नहाये धोये क्या भया, जो मन मैल न जाय। मीन सदा जल में रहे, धोय बास न जाय।। 3- दीदार दिलरूबा का, दीदार कह कहाँ है। देखा जो उस तरफ तो, इस तरफ वह कहाँ है।। 4- छू ले तू आसमान, जमीं की तलाश न कर, जी ले तू जिन्दगी कभी, खुशी की तलाश न कर, तकदीर बदल जायेगी अपने आप ही, ऐ मेरे भाई बस मुस्कुराना सीख लें, वजह की तलाश न कर। 5- जिन्दगी कभी उफ़, तो कभी आह होती है, ज़िन्दगी आह तो कभी वाह होती है, मुश्किल में कभी मुस्कान को न भूलें, क्योंकि मुस्कान से हर मुश्किल आसान होती है। 6- माना कि जिन्दगी में मुश्किलें खड़ी होती हैं घबराईए मत, वे हर मुश्किल से पार निकल जाते हैं जिनकी सोच बड़ी होती है। 7- अपने शुद्र अहम् का त्याग करो सफलता तुम्हारे पांँव चूमेगी। 8- भाव, ग्राहि जनार्दन। पृष्ठ 55 - कहावतें - - - - 1- पहली छोटी सेवा करना तो सीखो, फिर बड़ी सेवा का इंतजार करना, कहावत है , पहली भाटो तो उठा, डूंँगर के बांँथ पाछे पड़जे। 2- ##दगाबाज़ दूणो मवै 3- मधु पी लेते सभी, मधुप बन विषपान कठिन है। 4- भावाद्वैतं सदा कुर्यात क्रियाद्वैतं न कुत्र चित्त। 5- श्मशान - शिव का क्रीड़ा स्थल, जन का ज्ञान स्थल, शव का विश्राम स्थल 6- इनसे संतोष न करें - भजन, अध्ययन, दान 7- इनसे संतोष करें - भोग, भोजन, वित्त, परिवार, लोकेष्णा 8- आत्मानि प्रतीकानीं परेषानं समाचरेत् । 9- ##राजा कालस्य कारणम् 10- तुलसी हाय गरीब की, कभी न खाली जाय। 11- लीक लीक गाड़ी चले, लीक ही चले सपूत। लीक छोड़, तीनों चले शायर, सिंह, कपूत।। पृष्ठ 56- 1-दुःस्वप्न नाश के लिए - रामं स्कन्दं हनुमन्तं वनैतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरे नित्यं दुःस्वप्न तस्य नश्यति।। 2- सर्व देव प्रपन्नाय तवस्मिति च याचते। अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्य एतद् व्रतम्। 3- द्रव्य शुद्धि क्रियाशुद्धिर्मन्त्र शुद्धिश्च भूमिप। भवेद्मदि तदा पूर्णं फलं भवति नान्यथा।। 4- ##यह सृष्टि गौरव गज ग्रसित है, ग्रह दशा के ग्राह से है भक्तवत्सल शुभ सुदर्शन चक्र आप चलाइए। पृष्ठ 57- 1- सुख शय्या के बजाय, काँटों की गली में, कीर्ति को पकड़ो। - टॉलस्टॉय 2- प्यास कर्म के चुल्लू से ही बुझती है, वचनों के समुद्र से नहीं। - भास 3- क्षुधार्तो न तृणं चरंति सिंहः। - भूखा शेर घास नहीं खाता। 4- प्रशंसा शब्दों से नहीं, कर्मों से मानी जाती है। - लिंकन 5- आपत्ति मनुष्य बनाती है, सम्पत्ति राक्षस। - बेकन 6- उच्च पद पर टेढ़ी- मेढी़ सीढ़ी के बगैर नहीं पहुंँचा जा सकता। - बेकन 7- दो भले कान, सौ ज़बानों को ख़ुश्क कर सकते हैं। - फ्रैंकलिन 8- जिसकी इन्द्रियाँ बस में नहीं हैं , वह एक ऐसा मकान है, जिसकी दिवारें गिर चुकी हैं । - सुकरात 9- जो अपने भीतर डुबकी लगाता है, वह वहीं बस जाता है, लौटता नहीं, लौटता है तो ऐसा मोती लाता है, कि तारे भी शरमा जाते हैं। 10- जैसी करनी वैसा फल, आज नहीं तो निश्चित कल। पृष्ठ 58- 1- घृणा करना जैसे चूहे को घर से बाहर निकालने के लिए घर को जलाता है। - बर्जिल 2- मुझे देखकर कोई नाक- भौं न सिकुड़े मुझे, बस दुनिया से इतना ही लेना है। - अमृता 3- धनधान्य प्रयोगेसु विद्या संग्रहेणषु च। आहारे व्यवहार च त्यक्तं प्रजा सुखी भवेत्।। 4- हालाँकि खुदा की चक्की धीरे-धीरे पीसती है लेकिन बड़ा ही पीसती है। - लोंगफैंको 5- थोड़ा- सा भी झूठ मनुष्य का नाश कर देता है, जैसे दूध को एक बूँद जहर की। - गांँधी जी 6- भोलेनाथ का परिवार - - - काहे न मांँगत भीख फिरे, घर में नहीं अन्न न एक अधेला। मुख एक जो होय तो काम चले, मुख ही मुख से घर माहिं झमेला। शीश चढ़े सहस्रानन है और गजानन गोद लिए हैं गदेला झमेला। चतुरानन बाप पंचानन आप षडानन पूत दशानन चेला। पृष्ठ 59- 1- Every thing is fair in love and war. 2- What we are now is the second of our past actions and what we all in future that entirely depends upon our present deeds. It is fundamental truth that doer of good or giver of charity never comes to a grief. 3- Failure doesn't mean you are a failure. It is just means you haven't succeeded yet. 4- If winter comes can spring before behind. 5- Life is beautiful only for those who can citrate pain. 6- If a meritorious person becomes angry even than he is more usefull as a milk is sweet naturally but when it is churned its product butter is gained and that is more sweet.

No comments:

Post a Comment