Friday, May 26, 2023
श्रद्धा टिबरेवाल के काव्य संग्रह को पढ़ते हुए
कवयित्री श्रद्धा टिबरेवाल ने अपने प्रथम काव्य संग्रह में लिखा है -
"श्रद्धा पूर्ण है और है संपूर्ण खुद में" अपने में अपने आप को खोजना ही भारतीय जीवन दर्शन का मूल है जो हमारे उपनिषदों में आता है - -
इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत पूर्ण होने पर भी वह परब्रह्म परिपूर्ण है। उस पूर्ण में से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही शेष रहता है।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
पूर्ण मदः पूर्ण मिदम् पूर्णात पूर्ण मुदच्यते
पूर्ण मादाय पूर्ण मेवावशिषयते
कविता भावों को शब्दों में ढालती है और उन्हें विभिन्न आकारों में जन्म देती हैं। माता-पिता के साथ मीठी भावनाओं की डोर में बंधी है कवयित्री। समाज की दकियानूसी परंपराओं और विचारों को नकारते हुए एक नई सोच को जन्म देती हैं श्रद्धा टिबरेवाल की कविताएं।
पिता इबादत और माँ की परछाईं में अपने अस्तित्व को गढ़ती और संवारती है।' लिंग विकलांग' कविता में विकलांग बच्चों के पैदा होने में वे सृष्टि का निर्माण करने वाले का दोष मानती हैं। इसके लिए समाज को फटकारती हैं।
बलात्कार जैसी गंदी और वासना से भरी करतूतों के लिए वे उस पुरुष को दोषी मानती हैं जो ऐसे गंदे कृत्य करके भी 8और 80 की उम्र का ख्याल नहीं करता।वे कविता 'जिंदा हो तुम' में मानती हैं कि मनुष्य वही है जिसमें -
'शरीर बिना आत्मा के
हृदय बिना भावना के
धमनियां बिना धारा के
अगर होती हैं जिंदा'
तभी वह जिंदा मनुष्य की श्रेणी में आ सकता है। 'बुनियाद' 'कविता में जड़ बिन पेड़ नहीं, नींव बिन नहीं मकान
बुनियाद बिन कुछ नहीं, रखना तू ध्यान।
एक ओर जहां' बेटी बहू',' श्रृंगार' , 'सांझ' , 'सजी है धरा' , 'मैं नारी हूँ' , 'चोट' आदि कविताओं में कवयित्री सकारात्मक ऊर्जा और भावों को रोपती है, कई सवाल जवाब और तर्कों के साथ वह जीवन को ऊर्जवसित करती है। वहीं 'मेरे हमराह' में अपने प्रिय के साथ को अपनी शक्ति मानती है। जीवन के इस पडा़व तक पहुंचने के पीछे प्रिय के प्रति ही विश्वास भरा हुआ है - -
'तेरा विश्वास हर बार मुझे फिर वो संबल देता '
प्रकृति मौन क्यों रहती है? कवयित्री सलाह देती है - -
' आईने में छुपकर जो अब भी मौन ही पसराओगे
आनेवाली नस्लों को फिर क्या आईना दिखाओगे '
70 से अधिक कविताओं को श्रद्धा टिबरेवाल ने अपने प्रथम काव्य संग्रह की माला में पिरोए हैं।
हर छोटी-छोटी भावनाओं पर कवयित्री अपने भावों में व्यक्त करती है। सरल, सहज और बेबाकी से अपनी बात को कहने का साहस रखती है। कविता शब्द और अर्थ की सम्मिलित बनावट है जिसमें शब्द की बुनावट प्रमुख होती है जो काव्य को सौंदर्य प्रदान करती है।
कवयित्री ने भरसक प्रयास किया है। कविता को लिखते लिखते वह अपने आप आकार लेती है, उसे अभी खूब घिसने की आवश्यकता है।
अज्ञेय का भी मानना है कि देवता भी जहां रुके कि शिला हो गये, और प्राण-संचार के लिए पहली शर्त है गति, गति, गति ! कवयित्री सजग है उसकी तमाम कविताएँ अपनी अभिव्यक्ति के दायरे में जीवन की सहज अनुभूतियों और संवेदनाओं को प्रकट करती हैं और इनमें मनुष्य के मन के विविध रंगों का समावेश हुआ है ।पारिवारिक, सामाजिक कुरीतियों, रिश्ते - नातों और स्त्री अस्मिता के प्रति अपने भावों को आकार देती है।
कविता जीवन से आत्मीयता और प्रेम को प्रकट करने वाली है और हृदय के सघन एवं विरल भाव दोनों ही रूपों में व्यक्त हुए हैं । इस दृष्टि से इस कविता संग्रह में संकलित कविताओं का अर्थ विवेचन किया जा सकता है क्योंकि इनमें कवयित्री के जीवन के यथार्थ में उसके सुख – दुख के साथ सिमटी अन्य तमाम बातें भी हमारे परिवेश और इसके यथार्थ से ही उपजी प्रतीत होती हैं ।
इन कविताओं में मानव मन के सरल निश्छल भावों की अभिव्यक्ति समायी है और किसी पावन स्वर की तरह से कोई जीवन राग इन कविताओं में गूँजता अभिभूत करता है ।अपने समय और समाज की विसंगतियों की पहचान इस संग्रह की तमाम कविताओं का एक विशेष गुण है और इसे काफी सरलता जीवंतता से इन कविताओं में देखा जा सकता है। कवयित्री श्रद्धा टिबरेवाल को बधाई और शुभकामनाएँ।
डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता
mishrakolkata@gmail.com
26.05.2023
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