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Saturday, May 6, 2023

उषा प्रियंवदा कहानी वापसी

उषा प्रियंवदा (जन्म २४ दिसम्बर १९३०) प्रवासी हिंदी साहित्यकार हैं। कानपुर में जन्मी उषा प्रियंवदा ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. तथा पी-एच. डी. की पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन किया। इसी समय उन्हें फुलब्राइट स्काॅलरशिप मिली और वे अमरीका चली गईं। अमरीका के ब्लूमिंगटन, इंडियाना में दो वर्ष पोस्ट डाॅक्टरल अध्ययन किया और १९६४ में विस्कांसिन विश्वविद्यालय, मैडिसन में दक्षिण एशियाई विभाग में सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्य प्रारंभ किया।[1] आजकल वे सेवानिवृत्त होकर लेखन और भ्रमण कर रही हैं। उषा प्रियंवदा के कथा साहित्य में छठे और सातवें दशक के शहरी परिवारों का संवेदनापूर्ण चित्रण मिलता है। उस समय शहरी जीवन में बढ़ती उदासी, अकेलेपन, ऊब आदि का अंकन करने में उन्होंने अत्यंत गहरे यथार्थबोध का परिचय दिया है। कहानी संग्रहः वनवास, कितना बड़ा झूठ, शून्य, जिन्दग़ी और गुलाब के फूल(1961), एक कोई दूसरा(1966), फिर वसंत आया (1961), कितना बड़ा झूठ (1972) धनंजय सिंह (पटना विश्वविद्यालय) उपन्यासः - पचपन खंभे लाल दीवारे (1961) , रुकोगी नहीं राधिका (1967) , शेषयात्रा (1984) , अंतर्वंशी (2000) , भया कबीर उदास (2007) , नदी (2013)। पुरस्कार व सम्मान संपादित करें वर्ष २००७ के पद्मभूषण डॉ॰ मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार[2] से सम्मानित। वापसी और ज़िंदगी और गुलाब के फूल उनकी अतिचर्चित कहानियाँ हैं तो पचपन खंभे, लाल दीवारें उनका बहुचर्चित उपन्यास है। उषा प्रियंवदा की रचनाओं में संयुक्त परिवार का विघटन दिखता है तो आधुनिक जीवन की ऊब और अकेलेपन की स्थिति को भी चिन्हित किया जाता है। वापसी' कहानी में परंपरा और आधुनिकता का द्वंद्व है। आधुनिकता के इस दौर में दो पीढ़ियों के बीच हो रहे बदलाव व टकराव का लेखा जोखा प्रस्तुत है। कहानी में सेवानिवृत्त हो कर घर लौटे गजाधर बाबू को अपने ही घर में पराया कर दिए जाने के कटु अनुभवों को चित्रित किया गया है।30-Jun-2020 बैठक में पड़ी उनकी चारपाई सज्जा के अनुरूप ना होने के कारण सरकती सरकती कभी ड्राइंग रूम में ,कभी रजाइयों के ढेर के पास या अचार के मर्तबानो से भरी अलमारी के समीप पहुंच जाती हैं । उनकी उपस्थिति घर के सदस्यों को कितनी नागवार लगती है इसका एहसास उन्हें कई बार होता है । सेवानिवृत्त हो घर लौटते समय उनके मन में पलती सारी आशाएं और संजोए स्वप्न धराशाही हो चूर चूर हो जाते हैं । कुर्सियों को दीवाल तक सरकाकर अस्थाई सदस्य के लिए डाली गई चारपाई की तरह , डाली गई अपनी चारपाई पर अकेले पड़े-पड़े उन्हें अपना समूचा अस्तित्व निरर्थक लगने लगता है । लेखिका ने स्पष्ट कर दिया है कि देशी हो या विदेशी नई पीढ़ी संस्कार हीन, आत्म केंद्रित और स्वार्थी है । उपयोगितावाद और उपभोक्तावाद की लहर उन पर हावी है । गजाधर बाबू जिस सम्मान के हकदार थे । सेवानिवृत्त गजाधर बाबू नहीं रहे । जिस परिवार के लिए जीवन भर खटते रहे, उसकी आंखों में अब खटकने लग थे । घर भर का खटराग समेटने के कारण उनकी पत्नी की उपयोगिता पूर्ववत बनी रही थी इसलिए गजाधर द्वारा पुनः बाहर जाकर सेठ की चीनी मिल में नौकरी करने का निर्णय करने पर, वह उनके साथ नहीं जाती । अकेले अपना सामान लेकर जाते हुए देखने पर भी उनके बेटे उनसे कुछ पूछते नहीं हैं । उन्हें रोकने की जरूरत नहीं समझते । उनके जाते ही उनकी चारपाई कमरे से बाहर निकाल दी जाती है । उक्त पारिवारिक विघटन का कारण अर्थाभाव ना होकर निवास स्थान की कमी और पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित होती नई पीढ़ी की बदलती मानसिकता है । वस्तुतः अमरीका द्वारा सौंपे गए अपने वेस्ट को ही अपना बेस्ट समझ भारतीय युवा बौरा रहे हैं । एक अन्य व्यापक यथार्थ को जिसे कहानी व्यक्त करती है वह यह है कि अपने ही बनाए घर में, एक लंबी अवधि बाहर निकालने के बाद लौटे गजाधर बाबू मिसफिट हो जाते हैं । जिस अकेलेपन से उन्हें निजा़त मिली थी उसी में फिर वापसी उनकी नियति बन गई । यह असंगत स्थिति कहानी शिल्प विन्यास तथा रचना प्रक्रिया का एक स्वाभाविक और अपरिहार्य अंश बनकर पाठक पर अपना सामूहिक प्रभाव डालती है । कहानी विभिन्न घटना प्रसंगों का ऐसा संकलन है जिसे किसी निश्चित शिल्प के फ्रेम में फिट करना है ।उसमें शास्त्र निरूपित शिल्प सौष्ठव को खोजना बेमानी होगा ।वर्णनात्मक के स्थान पर चित्रात्मक शैली तथा पात्रों के क्रियाकलाप और संवाद कथा विकास के अवलम्ब बने हैं परिवेश को यथार्थता प्रदान करने के लिए गजाधर बाबू के घर में घुसने के साथ पात्रों के मुंह पर आई सकपकाहट ,घर में पसर गए सन्नाटे का प्रयोग किया गया है। इधर-उधर उठा कर धरी गई चारपाई गजाधर बाबू की अवांछनीय उपस्थिति को व्यक्त करती है । कहानी का मूल ढांचा परंपरागत है। कुछ नया , विशेष ना होते हुए भी कहानी अपनी भाषा क्षमता के कारण अत्यंत प्रभावी है। प्रोफेसर नामवर सिंह की स्थापना है -“यह दूसरी कहानी है ऊषा प्रियंवदा की जो ‘नई कहानियों ‘ में अगस्त 1960 में प्रकाशित हुई और जिसे पत्रिका की ओर से वर्ष का प्रथम पुरस्कार दिया गया ।” उषा जी की औपन्यासिक कृतियां भी उनकी कहानियों की तरह ही लोकप्रिय रही हैं । भारत और अमेरिकी पृष्ठभूमि पर रचित उनके उपन्यासों का तानाबाना अत्यंत व्यापक है । अधिकांश कृतियां मध्य वर्गीय परिवार से जुड़ी आधुनिकता की दौड़ में भागती नारी के अंतर्द्वन्द, वैचारिक वैमनस्य के कारण पारिवारिक ,सामाजिक,दाम्पत्य संबंधों की टूटन को रेखांकित करती हैं। यह विघटन पात्रों की मानसिकता को भी प्रभावित करता है और वे तनाव और अकेलेपन से ग्रस्त हो जाते हैं । लेखिका ने अन्य परंपरागत रिश्तो की गढ़न को नकारते हुए उसे वर्तमान संदर्भ में विभाजित किया है । वे अपने दीर्घकालीन प्रवासी जीवन में भी पारिवारिक,सामाजिक, आर्थिक, वैषम्य पूर्ण स्त्रियों के संत्रास भरे जीवन की प्रत्यक्षदर्शी रही हैं ।उनका सूक्ष्म निरीक्षण तथा विस्तृत अनुभव ही गहरी संवेदना के रूप में उनकी कृतियों में अभिव्यक्त,प्रतिध्वनितहुआ है।

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