Friday, May 12, 2023
शुभ्रा उपाध्याय की लंबी कविता काठ गोदाम के अक्स को पढ़ते हुए
काठ गोदाम के अक्स - एक लंबी कविता पढ़ते हुए - - - डॉ वसुंधरा मिश्र, भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज, कोलकाता
डॉ शुभ्रा उपाध्याय की लंबी कविता 'काठ गोदाम के अक्स' स्मृतियों के झरोखे से झिलमिल करती हुई झलकियाँ हैं। छोटे भाई की उस विदाई में खुशी नहीं बल्कि बिमारी का खौफ़ था ।
तीस पैंतीस साल पहले की स्मृति इस कविता को रचती है। जब वह अस्वस्थ छोटे भाई का इलाज कराता है लेकिन कब तक वह भाई के साथ चल पाएगा। भाई के साथ बिताए दिनों की स्मृतियाँ ताजा हो उठती हैं । बहुत लंबे समय का अंतराल हो चला था लेकिन यादें कल की- सी लगती हैं। महानगरीय रोशनी से नहाई कलकत्ता की सड़कों की यादें ताजा हो उठीं। जैसे कोई फिल्म की रील खुल पड़ी हो और वे एक - एक करके आँखों के सामने से गुजरने लगी हों।
'काठ गोदाम का अक्स' कविता का शीर्षक ही अपनी कहानी कहता दिखाई दे रहा है। मस्तिष्क के गोदाम में रखे यादों के चित्रों का सिलसिला निकल पड़ता है और फिर अक्स बनकर मूर्त रूप लेते हुए मानो उस सड़क का हिस्सा बन जाते हैं । काठ का गोदाम जहाँ चित्रों की श्रृंखला बनती है, फिर बनती है और फिर किसी अनजानी चिड़िया की तरह फुर्र भी हो जाती है । काठ के गोदाम में बीते दिनों का वह अदृश्य बक्सा है जो बहुत - सी स्मृतियों से भरा पड़ा हुआ है।
विदाई के क्षण बहुत ही भारी एहसास से भरे होते हैं। उसका छोटा भाई उसके पैर छूने के लिए झुकता है लेकिन
' चरण छूने को झुके भाई के कंधों को
तुम्हारी आँखों ने ही थाम लिया था।' कवयित्री ने यहाँ भारतीय संस्कार और संस्कृति का परिचय देते हुए कविता की शुरुआत की है।
अस्वस्थ भाई का बिछड़ना और हाथों का छूटता जाना बड़े भाई के लिए बहुत ही असहनीय और कष्टदायी था। छोटे भाई को पैरलाइसिस का अटैक आया था। लखनऊ में उसके इलाज के दौरान बड़ा भाई साथ था और अब तो काफी सुधार था। बड़ा भाई कब तक साथ चल पाएगा? क्या अब साथ दे सकेगा?
'अब तुम चुप थे
जैसे तय कर रहे हो
कि अभी और कितना चलना चाहते हो भाई के साथ
भाई के लिए'
समय के साथ अक्स भी बदलते हैं, इस कविता का केंद्र बिंदु है। 'अतीत के किसी गिरे फंदे के खिंचाव में स्वेटर सा उधड़ता ही जा रहा था' पंक्तियाँ कविता को फ्लेश बैक में ले जाती हैं। पिता की तरह धोती-कुर्ता पहनता था भाई और उसकी रफू भी बाद में बहन ही करती है।
बहन उस मुंहबोला भाई से पहली बार परिषद के कार्यालय कक्ष में मिली थी। 'जितनी बार भी मिलते /लगता पहली बार मिल रहे हैं।' हमेशा उस मिलने में नयेपन का एहसास होता।
हावड़ा ब्रिज से डलहौजी और माँ माटी मानुष के माँ ब्रिज पर गाड़ी में चलते हुए यादों की न जाने कितनी परतें खुलती जा रही थीं। डलहौजी की जानी पहचानी सड़कें, गलियांँ, रघुकुल आर्य विद्यालय बड़े भाई के साथ का हमजोलीपन, सब कुछ आँखों के सामने फिल्म की रील की तरह दिखाई पड़ने लगी । मेरी बेटी मेडिकल कर रही है और बेटा डॉक्टर बन गया है, भाई को सब कुछ याद है -
सुधियों के टिमटिमाते जुगनू
भटकैया के श्वेत बैंगनी फूलों की तरह
खिलखिला रहे थे। (मुक्तांचल जनवरी - मार्च 2023, पृष्ठ 86)
यादों के 'कई जंगले एक साथ खुल गए'। गाड़ी में लांग ड्राइव का अलग ही अनुभव है जब बगल में चहेता व्यक्तित्व बैठा हो। उसकी आत्मीयता और घनिष्ठता बड़ी सुखद और सुकून देती है। वर्तमान में भाई कोलकाता में अपनी चाची के यहाँ रह रहे थे जो रिश्ते में उनकी मौसी भी हैं।
बचपन का दालान, कच्चे पक्के आंँगन, ओसारे की प्रदक्षिणा में खो जाना और फिर वर्तमान में लौट आना और पूछना 'और तुम्हारा जन्म किस वर्ष का है?'
लड़की होने के कारण स्कूल में देर होना मामूली बात थी। बहन को अपनी तीस पैंतीस साल पहले की तस्वीर सामने 'रिवाइंड - फिल्म - रील 'की दिखने लगती है। 'सफेद फ्राक लाल बेल्ट सफेद मोजे और काले जूते पहने, बालों में दो लाल फीते के फूल बांधे 'एक स्वप्न की झांकी लगने लगी थी। कोलकाता के जालान कॉलेज में पढ़ना और वहाँ के हिंदी विभाग के अध्यापकों की पूरी लिस्ट प्रोफेसर झा जी शुक्ला सर माधुरी मैम विमला मैम डॉ कुशल सिंह और प्रधानाचार्य डॉ इंद्रावती सिंह और कॉलेज की सँकरी सीढ़ियाँ और बरामदा सब कुछ भाई और बहन मानो अपनी आँखों से रूबरू होते देख रहे हैं। स्टॉफ में काम करने वाली नंदा मासी की तस्वीरें घूमती नजर आने लगीं। बहन ने
इला का नाम भी प्रोफेसर की लिस्ट में देखा था। वह कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रभावशाली प्रोफेसर की बेटी थी। बहन के बैचेन मन में कई सवाल उथल-पुथल मचा रहे थे। बहुत सी बातें उमड़ - घुमड़ रही थीं लेकिन फोटो स्मृतियों में 'काठ उकेरी कलाकृतियों की भांति बंद थीं।'
स्मृतियों की फिल्म बड़ी तेजी से चलने लगी थी - 'काठ गोदाम के तमाम अक्स /अचानक जैसे सांस लेने लगे थे /छातियांँ धड़कने और हाथ - पांव हिलने लगे थे /पलकें स्पंदित पुतलियाँ भीगने लगीं थीं। '
बहन जानती थी कि भाई उस समय का साक्षी रहा है, वह उस रहस्य का पर्दा उठाना चाहती थी। उसने शांतिनिकेतन में पढ़ाने वाली मधुर गीत गाने वाली प्रो मंजूरानी सिंह का भी जिक्र किया साथ में नागार्जुन को पढ़ना और भी बहुत कुछ।
घंटे भर की इस गाड़ी की यात्रा में भाई के साथ यादों को बांँटती हुई बहन के सामने यादों की - 'पगडंडियों की ओर छोर में गुम थे '।
लंबी कविता 'काठ गोदाम के अक्स' अपनी सहज, सरल और संवेदना से पूर्ण यादों में खोती हुई फिर से भावों में खो जाती है। भाषा शिल्प कला मस्तिष्क को झकझोरती हैं और प्याज की परतों की तरह एक दूसरे में गुंथी हुई कई रहस्यों को रेखांकित करती है। शिक्षण संस्थानों में नियुक्ति से संबंधित अनियमितताएंँ, प्रेम संबंधों का टूटन, जानते हुए भी किसी का मुँह न खोलना, एक लंबे अवसाद को दबा कर रखना आदि बहुत से ऐसे रहस्य जिन्हें पूछना भी मन में ही रह जाते हैं।
डॉ शुभ्रा उपाध्याय की यह कविता अतिआधुनिक समय में परंपरागत संस्कृति के संरक्षण को भी उजागर करती दिखाई पड़ती है। हम अपने जीवन में विगत समय में घटित यादों को ताजा कर अपने को विश्लेषित करते हैं।वैसे तो यादें तो सिर्फ पीछे छूटती हुई एक परछाई है।
बधाई और शुभकामनाएं।
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