Saturday, May 6, 2023
अलका सरावगी की रचनात्मक भूमिका के लिए
अलका सरावगी
जिस तरह व्यवस्था को बेहतर बनाना राजनीति का काम है उसी तरह साहित्य का काम है व्यक्ति के अंतर्मन को बदलना। इसीलिए कहा जाता है कि साहित्य अंतर्मन की राजनीति करता है। वह लोगों की भीतरी चेतना को जगाता है। तभी साहित्य से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने समाज को ऐसा माहौल दे सके, जहां पहले से कहीं बेहतर की आशा हो और उसके लिए प्रयास के साथ चिंतन और संवाद भी निरंतर बने। अपने उद्देश्यों से ही साहित्य हमेशा समाज में बराबरी का पक्षधर रहा है और ऐसे समाज की परिकल्पना करता है जहां अंतिम जन तक की चिंता हो
मनुष्य के लिए प्रकृति एक वरदान की तरह है, जिसके अलग-अलग रूप में सौंदर्य झलकता है। लेकिन साहित्य कर्म में गंभीर दायित्व के चलते इससे भी अधिक सुंदर की कल्पना की जा सकती है, क्योंकि सिर्फ सौंदर्य के जरिए कहां तक पहुंच बन सकती है! इससे पाठकों की चेतना तक नहीं पहुंचा जा सकता। उसके लिए वास्तविक संघर्ष दिखने जरूरी हैं, जिनकी पहचान समाज के बीच रह कर ही हो सकती है। जब ये संघर्ष रचनाकर्म का हिस्सा बनते हैं और साहित्य के जरिए सुधी पाठक के अंतर्मन को झकझोरते हैं, उसके बाद यहीं से चेतना का संचार होता है, जो भावों के जरिए अपने से संभव अच्छा कर पाने के विचार तक ले जाता है। हालांकि रमणीयता भी कुछ समय के लिए मन को लुभाती अवश्य है।
सच्चा साहित्य सदैव समाज के बीच से होकर आता है। ऐसे में सृजन के लिए किसी रमणीय स्थान की खोज करने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि सौंदर्य हमारे आसपास ही बिखरा रहता है।
जैसे कहीं अच्छे विचारों के रूप में तो कहीं मिट्टी की खुशबू तक में सौंदर्य के दर्शन किए जा सकते हैं। आमतौर पर रात में प्रकाश के बल्ब की ओर झांकने पर चंद लम्हों में संपूर्ण जीवन के दर्शन हो जाते हैं, जहां एक तरफ कोई छिपकली अपनी भूख से संघर्ष कर रही है तो किसी छोटे कीड़े का पूरा जीवन दांव पर लगा है।
किसी भी साहित्य में उसका समाज और उस समाज के लिए चिंता, दोनों परिलक्षित होते हैं। तभी सच्चा साहित्य समाज की बेहतरी के लिए सतत रचनात्मकता को लिए चलता है।
आखिरकार संघर्ष की जमीन साहित्य के लिए सबसे उपजाऊ होती है, जहां बेहतर समाज के सपने रचनाकार देख सकता है।
हालांकि रचने का भी अपना संघर्ष है। तीव्र अनुभूति के जरिए जिस रचना का सृजन होता है, उसके पात्र रचनाकार को चैन नहीं लेने देते।
रचनाकार ‘कल्पना’ और ‘प्रत्यक्ष’ के मिश्रण से रचना में उतार कर उन्हें जीवन देता है वहां सौंदर्य स्वत: आ जाता है, क्योंकि सौंदर्य की उपस्थिति सहजता के अधिक निकट होती है। तभी संभव है कि किसी भी रचना में भरे वास्तविकता के रंगों की चमक कभी फीकी नहीं पड़ती। जैसे किसी मूर्तिकार द्वारा सदियों पहले बनाई गई अत्यंत आकर्षक मूरत के बारे में कहा जाता है कि ‘इसमें जैसे जान डाल दी हो कि आज भी सजीव नजर आ रही है’ अथवा ‘किसी चित्रकार की बनाई खूबसूरत तस्वीर देखकर लगता है जैसे अभी बोल उठेगी !’
आज जिस रचनाकार और कथाकार की पुस्तक हमारे सामने है वह भी एक खूबसूरत रचनात्मक यात्रा के साथ-साथ दो महान व्यक्तियों की कहानी है जिसमें सौंदर्य के साथ साथ एक संदेश भी है। गांधी और सरला देवी चौधरानी देश के प्लेटोनिक लव पर लिखना स्वयं रचनाकार के लिए भी साहस और चुनौतियों से भरा चिंतन है।
आइए! अलका सरावगी जी से सुनते हैं - -
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